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'नारी शक्ति' को गहराई से समझना हैं, तो ये किताबें जरूर पढ़नी चाहिए

टीम Her Circle |  August 07, 2026

ऐसी कई किताबें हैं, जो नारीत्व या स्त्रीवाद को गहराई से समझती है और आपको समझाती भी है। आइए इनके बारे में जान लेते हैं। 

वास्तविकता को करीब से समझने वाली किताबें

गौर करें, तो शशि देशपांडे की 'दैट लॉन्ग साइलेंस', एक शिक्षित, शहरी, मध्यमवर्गीय गृहिणी के चुपचाप, घुटन भरे समझौतों पर एक शानदार, धीमी गति से असर डालने वाली रचना है। यह उपन्यास इस बात को उजागर करता है कि कैसे समाज महिलाओं को मौन को जीवित रहने के एक तंत्र के रूप में इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करता है। वही अगर एक और किताब की बात करें तो बामा की 'संगति' (लक्ष्मी होल्मस्ट्रॉम द्वारा अनुवादित) भी अंतर-विभागीय नारीत्व को समझने के लिए एक मूलभूत रचना। यह ग्रामीण तमिलनाडु में दलित महिलाओं के जीवन के अनुभवों को दर्शाती है, और दिखाती है कि कैसे वे जातिगत क्रूरता और घरेलू पितृसत्ता के दोहरे उत्पीड़न से बहादुरी से लड़ती हैं। वही बात नारीत्व की हो और इस्मत चुगताई का नाम न आये, ये कैसे हो सकता है। जी हां, 'लिफ्टिंग द वेल' एक ऐसी किताब है, जो 20वीं सदी के शुरुआती दौर के मुस्लिम परिवारों की पड़ताल करने वाली तीखी, हास्यपूर्ण और बेबाक लघु कहानियों का संग्रह है और यह बात जगजाहिर है कि चुगताई नारी इच्छा, घरेलू बंधन की राजनीति के बारे में खुलकर लिखने वाली शुरुआती लेखिकाओं में से एक थीं। वहीं महाश्वेता देवी की 'ब्रेस्ट स्टोरीज' (गायत्री चक्रवर्ती स्पिवक द्वारा अनुवादित), लघु कहानियों का एक बेहद मार्मिक संग्रह, जो महिला शरीर को श्रम, सामाजिक-राजनीतिक शोषण और व्यवस्थागत राज्य हिंसा के ऐतिहासिक रूपक के रूप में उपयोग करता है।

चित्रा बनर्जी की किताबें

चित्रा बनर्जी की किताब 'द फ़ॉरेस्ट ऑफ़ एनचैंटमेंट्स' जरूर पढ़ी जानी चाहिए, क्योंकि यह रामायण की एक बहुत ही इमोशनल और नई तरह की कहानी गढ़ी गई किताब है, जिसे पूरी तरह से सीता के नज़रिए से लिखा गया है। इसमें उनके प्यार करने की क्षमता, उनकी अंदरूनी मज़बूती और सिस्टम से मिले धोखे का सामना करने का क्या मतलब होता है, इन बातों को दिखाया गया है। इनके अलावा, इनकी किताब 'द पैलेस ऑफ़ इल्यूज़न्स' भी बेहद खास है। यह मॉडर्न क्लासिक किताब महाभारत की कहानी में पांचाली (द्रौपदी) को केंद्र में रख कर कहानी कहती है और इसमें उनके मुश्किल फैसलों, उनकी अंदरूनी कमज़ोरियों और पूरी तरह से पुरुषों द्वारा रचे गए युद्ध में उनके कड़े विरोध को दिखाया गया है। इसलिए इसे हर महिला को एक नए नजरिए को समझने के लिए पढ़ने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।

कुछ जरूरी किताबें ये भी

निवेदिता मेनन की 'सीइंग लाइक अ फेमिनिस्ट' (Seeing Like A Feminist) भी एक खास किताब है और इसकी खासियत यह है कि यह एक बहुत ही आसान भाषा में लिखी गई किताब है,जो आधुनिक भारत में जेंडर से जुड़े रिश्तों और स्थितियों को समझने के लिए एक बेहतरीन शुरुआत है। इस किताब के जरिये आप जान पाते हैं कि कैसे परिवार, शादी, पहनावे और कानून जैसी रोजमर्रा की चीजों को महिलाओं पर नियंत्रण रखने के लिए खास तौर पर बनाया गया है। वहीं दीपा नारायण की 'चुप: ब्रेकिंग द साइलेंस अबाउट इंडियाज़ विमेन' (Chup: Breaking the Silence About India's Women) भी 600 से ज़्यादा विस्तृत इंटरव्यू पर आधारित है और आई ओपनर मानी गई है महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों को लेकर। वहीं यह सभी आर्थिक वर्गों की भारतीय महिलाओं में गहराई से बैठी उन मानसिक आदतों की पड़ताल करती है जो उन्हें सिखाई जाती हैं, जैसे चुप रहना, खुद को छोटा महसूस करना और खुद को सबसे आखिर में रखना।

माइथोलॉजी में खास महिलाएं

ऐसी कई किताबें लिखी गई हैं, जिसमें माइथोलॉजी की दुनिया में महिलाओं की प्राथमिकता को दर्शाया गया है, जो अमूमन नहीं दर्शाया जाता है। ऐसे में प्रतिभा राय की 'यज्ञसेनी: द स्टोरी ऑफ़ द्रौपदी' (ओडिया से अनुवादित) उन किताबों में से एक हैं, साथ ही यह किताब द्रौपदी के जीवन को बहुत ही सराहे गए, गहरे आध्यात्मिक और भावनात्मक नज़रिए से दिखाती है। इसमें उनके मन की स्थिति, कृष्ण के साथ उनके अनोखे रिश्ते और अपने पाँचों पतियों के साथ उनके संघर्षों को दिखाया गया है। साथ ही कविता काने की 'कर्ण्स वाइफ: द आउटकास्ट्स क्वीन', यह उपन्यास महाभारत के हाशिए पर मौजूद किरदारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, सत्ता के बड़े संघर्षों को उरुवी की नज़र से देखता है। उरुवी एक क्षत्रिय राजकुमारी है, जो जाति की बंदिशों और दरबार की राजनीति को चुनौती देते हुए एक 'आउटकास्ट' (समाज से बहिष्कृत माने जाने वाले) योद्धा से शादी करने का फ़ैसला करती है।

ये किताब है खास



अगर जसोधरा बागची की किताब के बारे में बात करें, तो 'इंटरोगेटिंग मदरहुड' (Interrogating Motherhood), यह एक ज़रूरी नॉन-फ़िक्शन किताब है, जो भारतीय संस्कृति में "त्याग करने वाली माँ" की छवि को महिमामंडित करने की संरचना का विश्लेषण करती है। वहीं जसोधरा बागची बताती हैं कि कैसे मातृत्व को दैवीय दर्जा देने का इस्तेमाल अक्सर महिलाओं को उनके वास्तविक राजनीतिक, आर्थिक और शारीरिक अधिकारों से वंचित रखने के लिए किया जाता है।

*Images used are only for representational purpose.


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