मां सपने देखती है, अपने बच्चों के लिए। अपने बच्चे के सपने पूरे करने के लिए दुआएं करती हैं और उनका समर्थन करती हैं। यहां तक कि एक मां अपने सपने में भी अपने बच्चों को पंख फैलाकर कामयाबी की ऊंचाई पर देखती है। वहीं बात, जब बात अपने सपने को पूरा करने की आती है, तो मां बनने के बाद उसका ख्याल तक सपने में नहीं आता है। हालांकि हमारे आस-पास कई मां मौजूद हैं, जो अपने सपने को पूरा करने का हौसला रखती हैं और कई अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा भी बनी हैं। आइए जानते हैं एक मां के सपने के पूरा होने सफर के बारे में।

अन्नपूर्णा रोटी उद्योग की प्रमुख रंजना वाघमारे कहती हैं कि मेरे हिसाब से सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती है। मैंने जब रोटी का व्यवसाय शुरू किया, तो मेरे पास उस वक्त शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारी थी। लेकिन मैंने सोचा कि क्यों न मैं अपने रोटी बनाने की कला को बिजनेस का रूप देकर खुद के बिजनेस वुमन बनने का सपना पूरा करूं। साथ ही मैंने कई ऐसी महिलाओं के सपने को भी जगह दी है, जो कि खुद को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने का सपना देखती हैं। आज मेरे साथ कई सारी ऐसी महिलाएं काम करती हैं, जिनका सपना हमेशा से खुद के पैरों पर खड़ा होना था। क्रिकेट खेलने के सपने को पूरा कर चुकीं 72 साल की तरू संघवी कहती हैं कि सपने देखने के लिए कोई उम्र नहीं होती है। मैं 72 साल की उम्र में क्रिकेट खेलने के अपने सपने को पूरा कर रही हूं। मैं मुंबई के एक क्लब के लिए खेलती हूं। इस उम्र में खेलना मेरी लिए एक सपने को पूरा करने जैसा है। मैं जब तक जिंदा रहूंगी, मैं तब तक खेलूंगी।

निता सत्रा कहती हैं कि खेलना हमेशा से मेरी पसंद रहा है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं क्रिकेट खेल सकती हूं। 50 की उम्र पार करने के बाद परिवार को संभालने के बीच अपने शौक को जिंदा रखना और उसे पूरा करना मेरे लिए सपने जैसा ही है। आज कई लोग मुझे अपनी प्रेरणा मानते हैं और कहते हैं कि जिस तरह आपने अपने खेलने के सपने को पूरा किया, हम भी अपने सपने को साकार करने की कोशिश करेंगे।

मुंबई के जेएलेस बेवी महिला ग्रुप की सदस्य जिगना सरैया बताती हैं कि मेरे पति का गुजर जाने के बाद मैंने अपनी बैंक की नौकरी जारी रखी। लेकिन मेरा मन उस काम में नहीं लग रहा था। मैं डिप्रेशन में जा रही थी।कुछ साल काम करने के बाद मैंने बैंक काम छोड़ दिया। इसके बाद मैंने खुद की कला में यकीन दिखाया और मैंने अपने बच्चों और दोस्तों के खास दिन पर केक बनाना शुरू किया। कोरोना वायरस के समय मेरे खाने के गुण को मैंने और पॉलिश किया और ऑर्डर लेना शुरू किया। इस तरह से मैंने अपने सपने को उड़ान दी।
सही मायने में देखा जाए, तो सपने सभी के पास होते हैं, उन्हें पूरा करने का हौसला अक्सर जिम्मेदारी के बोझ के तले दबा रह जाता है। लेकिन अपने सपने को दबाना अपनी खुशी से समझौता करना है। इसलिए बहुत जरूरी है कि एक मां अपने ममता भरे आंचल में अपने बच्चे के सपने के साथ खुद के सपने को भी तरजीह दे।