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अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस- दवा, व्यापार से रिश्तों तक का स्वाद भरा सफर

टीम Her Circle |  May 21, 2026

हर साल अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस 21 मई को मनाया जाता है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि देश हो या विदेश, शहर हो या गांव, पानी के बाद चाय को सबसे अधिक पिया जाता है। गर्मी हो या ठंड, चाय ने हमेशा से लोगों के घर की रसोई में एक खास स्थान बनाकर रखा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि चाय की पत्ती का इतिहास क्या है।

चीनी सम्राट शेन नुंग ने पहली बार चाय का स्वाद चखा 

चाय को केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि सेहत के लिए भी पिया जाता है। लेकिन क्या आप जानती हैं कि चाय पीने की शुरुआत भारत से नहीं, बल्कि चीन से हुई थी। जी हां, इसके पीछे एक खास कहानी है। चीनी सम्राट शेन नुंग ने पहली बार चाय का स्वाद चखा था। ऐसा कहा जाता है कि जब सम्राट शेन अपनी सेना के साथ एक जंगल में आराम करने के लिए रूके, तो वहां पर उन्होंने पीने के लिए पानी उबाला और उस पानी में कहीं से कुछ पत्तियां आकर गिर गईं, जिसके बाद उसमें घुल गईं और इसी से शुरुआत हुई है, चाय को उबाल कर पानी में पीने की। 

पहली दफा 1824 में भारत में चाय की फसल

जानकारों के अनुसार चाय को पहली दफा 2737 ईसा पूर्व चीन में खोजा गया। इसके बाद अंग्रेजों ने पहली दफा 1824 में भारत में चाय की फसल उगाने की शुरुआत की और फिर दार्जिलिंग, नीलगिरी और असम में सबसे अधिक पैमाने पर इसे उगाया जाने लगा। चाय की लोकप्रियता और खपत भारत में तेजी से बढ़ गई। आज भारत में लगभग 90 करोड़ टन चाय का उत्पादन होता है। ज्ञात हो कि शुरुआती समय में चाय को औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।

भारत में चाय का इतिहास

भारत में चाय का इतिहास काफी साल पुराना है। असम के जंगलों से इसकी शुरुआत हुई। असम में खासतौर पर आदिवासी समुदाय चाय की पत्तियों का उपयोग दवाई बनाने के लिए करते थे। चाय की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए 1830 के दशक में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी चीन से आने वाली चाय का बिजनेस किया करती। 1834 में भारत में सबसे पहले चाय की एक खास कमेटी बनाई गई। इसके बाद असम में चाय की खेती का काम तेजी से शुरू हुआ। 

भारत में चाय की लोकप्रियता विस्तार से

भारत में चाय पहले दवाई और फिर हर दिन की शुरुआत का जरिया बन गई। शुरुआत में चाय केवल चाय की पत्तियों को मिलाकर और इसके बाद कई सारे मसालों का उपयोग करते हुए बनाया जाता है। इससे चाय का स्वाद और चार गुना बढ़ जाता है। भारत ने इसे अपने स्वाद के अनुसार बदल दिया है। पहले चाय और पानी को उबाला जाता है। इसके बाद दूध, अधिक चीनी और अदरक जैसी चीजें मिलानी शुरू की। इससे चाय और अधिक स्वादिष्ट और ऊर्जा देने वाली बन जाती है। धीरे-धीरे इलायची, दालचीनी, लौंग, काली मिर्च और अदरक डालकर “मसाला चाय” बनने लगी।

चाय का भारतीय संस्कृति से जुड़ा



भारत में चाय भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इंतजार, प्यार और इकरार से जुड़ा हुआ है। चर्चा और बातचीत का हिस्सा बन गई है। भारत में चाय आपको बस स्टैंड,रेलवे स्टेशन, कॅालेज, दफ्तर, बाजार और गावों की चौपालों पर भी चाय मिलने लगी है। कुल्हड़ की चाय के साथ कटिंग चाय में भी चाय लोकप्रिय है। सुबह की शुरुआत, दोस्तों की बैठक,परिवार की चर्चा में भी चाय की एक खास भूमिका है। चाय न हो, तो कई बार परिवार का स्वाद भी बेकार लगता है। 



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