महिलाओं की आजादी किसी कलम की मोहताज नहीं है। लेकिन साहित्य की दुनिया में एक नहीं कई बार और कई सालों से महिलाओं की आजादी की आवाज उठती रही है। कहते हैं एक किताब क्रांति ला सकती है। महिलाओं के जीवन को नई दिशा देने और उन्हें आजादी की राह दिखाने में कई लेखकों ने अपनी अविस्मरणीय योगदान अपनी लेखनी के जरिए दिया है। आइए विस्तार से जानते है, आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाओं पर आधारित प्रमुख हिंदी किताब और उपन्यासों के बारे में।
मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘इच्छामृत्यु’ की समीक्षा

यह उपन्यास एक ऐसी महिला की कहानी है, जो कि अपने जीवन के फैसले खुद लेने की हिम्मत रखती है। फिर चाहे वह जीवन के किसी भी पड़ाव पर क्यों न हो, इस कहानी में महिला अपने निर्णय लेने की क्षमता पर खरी उतरती हुई , समाज के सामने उदाहरण पेश करती हैं। एक तरह से देखा जाए, तो यह उपन्यास आत्मनिर्णय, नारी स्वाभिमान और सामाजिक ढांचे को चुनौती देता है। यह किताब एक तरह से नारी की इच्छाओं और उनके अधिकारों की गहन पड़ताल भी करती है।
अमृता प्रीतम की किताब ‘रसीदी टिकट’ की समीक्षा

अमृता प्रीतम की लिखी हुई यह किताब एक महिला के संपूर्ण अस्तित्व, उसके प्रेम, पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की तलाश की संवेदनशील को दिखाता है। उनकी लिखी हुई यह किताब भारतीय साहित्य में स्त्री आत्मकथाओं के लिए मील का पत्थर बन गई है। उनकी यह किताब एक महिला के जीवन के सामाजिक बंधनों के संघर्ष को दिखाती है। उनकी इस किताब में बचपन, मां की मृत्यु और पिता से रिश्ता भी दिखाया गया है। इस किताब में अमृता का जीवन, प्रेम, स्वतंत्रता और साहित्य को दर्शाया है। यह किताब एक ऐसी महिला की दास्तान हैं, जिसने समाज के नियमों की परवाह किए बिना अपना जीवन जिया और अपनी शर्तों पर प्रेम किया है।
उषा प्रियंवदा का लिखा हुआ उपन्यास ‘शेष यात्रा’ की समीक्षा

उषा प्रियंवदा द्वारा लिखा गया उपन्यास शेष यात्रा नारी जीवन की कई सारी स्थितियों को दिखाता है। यह उपन्यास नारी-जीवन की समस्याओं, खासकर उच्च-मध्यमवर्गीय प्रवासी भारतीय महिलाओं के संघर्षों को उजागर करता है। इस उपन्यास में अपने-अपने जीवन की चुनौतियों का सामना करते हैं। इस उपन्यास के जरिए लेखिका का यह उद्देश्य यह है कि दिखाना है कि साहस और संघर्ष से नारी अपनी नियति को बदल सकती है। उषा प्रियंवदा ने इस उपन्यास की भाषा को सहज रखा है और किरदारों को काफी गहराई से समझाया है। उषा प्रियंवदा के इस उपन्यास को नारी केंद्रित लेखन के लिए एक प्रमुख योगदान माना गया है। यह उपन्यास दिखाता है कि आजादी केवल युवाओं का विषय नहीं है, हर उम्र की महिला की जरूरत है।
कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘मिट्टी की नाव’ की समीक्षा

मिट्टी की नाव नारी केंद्रित उपन्यास है, जो कि नारी आजादी, सामाजिक व्यवस्था, प्रेम और आत्म सम्मान जैसे विषयों को बेहद साहसिक और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करता है। यह उनकी लेखनी की शुरुआत का दौर था और इसी उपन्यास से उन्होंने हिंदी साहित्य में एक सशक्त और बेबाक लेखिका के रूप में अपनी पहचान बनाई है। ज्ञात हो कि मिट्टी की नाव का शीर्षक यह दर्शाता है कि जीवन की यात्रा अस्थिर रहती है। दिलचस्प है कि यह उपन्यास महिलाओं की कामनाओं को भी सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया गया है।
कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ की समीक्षा
इस उपन्यास में एक महिला के शरीर की जरूरतों को समझाया गया है। लेखिका ने अपनी जरूरतों को पाप नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक और जरूरी संवेदना मानती हैं। यह उपन्यास हिंदी कथा-साहित्य में नारी देह की आजादी और उसके व्यक्तित्व की आजादी पर लिखी पहली साहसी रचनाओं में से एक माना जाता है। मित्रो मरजानी न सिर्फ मित्रो नामक एक बोल्ड महिला पात्र की कहानी है, बल्कि उस समाज विरोधी चेतना का भी प्रतिनिधित्व करती है, जो अपने अस्तित्व और कामनाओं के लिए आजाद और सचेत है।