होम मेकर यानी की गृहिणी, जो कि सालों से सस्टेनेबल लिविंग का एक बड़ा उदाहरण रही हैं। हालांकि सस्टेनेबल का जरिया एक महिला से होते हुए पूरे समाज तक फैला और फिर इसे पूरी दुनिया अपनाने लगी। सुविधा का अभाव और यातायात का साधन न होन के कारण हर कोई जो है उसी में अपना गुजारा करने की चाह रखता और इसी तरह सस्टेनेबल लिविंग पूरी दुनिया के लिए जीवन जीने का जरिया बन गया।
सुबह से होती शुरुआत

यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि पहले के जमाने में होम मेकर अपने दैनिक जीवन में छोटे- छोटे कामों से सस्टेनेबल लिविंग की शुरुआत करती हैं। जैसे कि घर में हर तरफ पानी का छिड़काव करना। घास से घर को साफ करने के लिए झाड़ू बनाना। इस तरह से घर में मौजूद चीजों का इस्तेमाल करते हुए दिन की शुरुआत की जाती रही है। पहले जहां घर में रंगाई यानी कि कलर लगाने का काम नहीं होता था। ऐसे में मिट्टी से बने हुए घर को तीज और त्योहार के समय पर गाय के गोबर से लेपा जाता था। पर्यावरण के संरक्षण का कार्य करते हुए प्लास्टिक का उपयोग न के बराबर होता रहा है। कपड़े के बैग और मिट्टी के बनाए गए बर्तनों का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता रहा है।
रसोई से शुरू हुई सस्टेनेबिलिटी

रसोई में मिट्टी के चुल्हे पर खाना बनाने से लेकर मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल रसोई के खाने को पौष्टिक और स्वादिष्ट बना देता था। खाने को पकाने के लिए सबसे पहले गाय गोबर के उपले का इस्तेमाल किया जाता, इससे पर्यावरण को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होता। इसके साथ ही घास से टोकरी बनाई जाती और पत्तों के बर्तन में खाना खाया जाता, जो कि सस्टेनेबल लिविंग को अच्छी तरह से बढ़ावा देता है। साथ ही रसोई की सजावट में चावल के पेस्ट से बने हुए रंगों का इस्तेमाल किया जाता। बर्तनों पर चावल के पानी का इस्तेमाल करते हुए सजावट की जाती और रसोई को पूरी तरह से मिट्टी और घास से सजाया जाता, जो कि दिखने में सुंदर और सस्टेनेबल होता है।
बचे हुए खाने का फिर से इस्तेमाल

सस्टेनेबल लिविंग में खाना का फिर से इस्तेमाल करना सबसे ज्यादा अहम रहा है। खेती का काम प्रमुख होता है, ऐसे में महिलाओं के पास अधिक समय नहीं होता था कि रसोई और खेती को साथ में संभाला जाए। इस वजह से एक समय की रोटी अधिक बनाई जाती , ताकि उसका इस्तेमाल फिर से किया जा सके। प्याज और टमाटर की चटनी बनाकर रोटी का सेवन किया जाता। साथ ही बचे हुए चावल को फिर से मसालों के साथ पकाकर इस्तेमाल किया जाता। ठीक इसी तरह बचे हुए खाने को फेंकने के बजाए उसको फिर से पकाकर इस्तेमाल किया जाता, जो कि एक स्मार्ट खाने का तरीका बन गया। घर के बनाए हुए मसाले और सब्जी का उपयोग अधिक किया जाता और खेती को महत्व दिया जाता रहा है।
जरूरत के हिसाब से खरीदारी

सस्टेनेबल लिविंग के हिसाब से खरीदारी करना भी उन दिनों की बात रही है। उस दौर में जरूरत के हिसाब से खरीदारी की जाती थी, महीने में एक बार या फिर सप्ताह में एक बार बाजार जाया जाता। लोग यह नहीं सोचते थे कि बाजार में क्या नया आया है या दूसरों के पास क्या है, बल्कि वे केवल वही सामान खरीदते थे जिसकी वास्तव में आवश्यकता होती थी। इसी कारण घरों में अनावश्यक वस्तुओं का ढेर नहीं लगता था और संसाधनों का सही उपयोग होता था। एक वस्तु के खत्म होने के बाद दूसरा सामान खरीदा जाता।
पानी और बिजली की बचत और रसोई के कचरे का इस्तेमाल
बर्तन धोने, कपड़े धोने और सफाई के दौरान पानी को व्यर्थ बहने नहीं दिया जाता था। कई घरों में बचे हुए पानी का उपयोग पौधों में या अन्य घरेलू कामों में किया जाता था। बारिश के पानी को संग्रहित करने और सीमित पानी में काम पूरा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती थी। पानी को केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन माना जाता था। जरूरत न होने पर बिजली को बंद रखा जाता। दिन के समय प्राकृतिक रोशनी का उपयोग किया जात।