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तकनीकी से पहले देसी दुनिया में मिलता सुकून

प्राची |  May 14, 2026

तकनीक यानी कि टेक्नोलॉजी जी हां, टेक्नोलॉजी ने हमारे जीवन को पहले से काफी आसान कर दिया है। इसी तकनीकी के कारण ही, शहर के साथ गांव भी रोशन हो रहे हैं। वर्तमान में मामला गूगल से AI तक पहुंच गया है। एक तरह से सोचा जाए, तो तकनीकी का हमारे जीवन में होना केवल लाभ ही लाभ दिखता है। तकनीकी के कारण हमारे हर दिन में सुविधाएं दिखाई देती हैं और जिंदगी आसान सी लगती है। ऐसा महसूस होता है कि कोई, है जो कि हमारी मदद के लिए हमारे पास मौजूद है। दूसरे देश में किसी से बात करना है, तो मोबाइल है,  कुछ जानकारी चाहिए या किसी तरह की नॉलेज, तो उसके लिए AI हमारे पास है। लिखने के लिए टैब और इलेक्ट्रॉनिक पेन भी मौजूद है। लेकिन आज हम आपको तकनीकी से पहले की दुनिया में लेकर जा रहे हैं। बता रहे हैं कि कैसे तकनीकी से पहले हमारे पास सुविधा कम थी, लेकिन उसमें असली जीवन का देसी स्वाद मौजूद था। आइए जानते हैं विस्तार से।

ई-बुक से पहले किताब और कॉमिक्स

इन दिनों छोटे बच्चों के लिए बाजार में कई सारे ई-बुक मौजूद हैं। फोन पर या फिर बैटरी के साथ कहानी की दुनिया से बच्चों को रूबरू कराया जाता है। लेकिन ई-बुक में दादी और नानी की कहानियों का स्वाद और सीख नहीं मिलती। भावनाएं और अपनापन नहीं मिलता है। गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर या फिर दादी के गांव जाने के बाद सभी बच्चों को किसी पेड़ की छांव में जुटाकर नानी या फिर दादी कई सारी प्रेरणादायक कहानियां सुनाती। इन सभी कहानियों के अंत में सीख होती, जो कि हमें सच्चाई के रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन करती। ई-बुक के तकनीक में हमें कहानी सुनने और सुनाने के लिए कोई साथी नहीं मिलता और दादी और नानी का प्यार भरा हाथ और सीख के ज्ञान से भी परिचित नहीं हो पाते हैं।

वीडियो कॅाल से पहले चिट्ठियां

आपने यह गाना, तो जरूर सुना होगा कि ‘चिट्ठी आई है’ और अगर आप इस गाने का अंतरा सुनेंगी, तो पायेंगी कि कैसे किसी का एक दूसरे व्यक्ति को खत लिखना केवल शब्दों की माला नहीं, बल्कि भावनाओं का सैलाब होता था। जहां पर लोग शब्दों के बीच अपनों का चेहरा तलाश करते थे। ऐसी कई बातें बोलते थे, अपने दिल का हाल बोलते थे, जो कि हर दिन के वीडियो कॅाल में भी बताना मुमकिन नहीं हो पाता है। खत में एक शहर से दूसरे शहर जाकर लिखी हुई चिट्ठियों में एक दूसरे की कुशलता का हाल जानने के साथ खुशियों और दुखों का मंजर भी होता था। तकनीक के जरिए हम अब चिट्ठी के बदले वीडियो कॅाल की दुनिया में पहुंच गए हैं, हर दिन हम अपने लोगों से बात करते हैं एक दूसरे की शक्ल देखते हैं, लेकिन भावनाओं का चेहरा छिपा लेते हैं। 

मिक्सर से पहले सिलबट्टा

असली स्वाद मां के हाथ की चटनी में आता है। क्या आप जानते हैं कि मां के हाथ की चटनी सिल और बट्टे के बीच पीसे हुए मसाले से आती है। मिक्सर से पहले किसी भी प्रकार का भोजन बनाने के लिए या फिर दाल और चावल को पीसने के लिए सिल और बट्टे का इस्तेमाल किया जाता। इससे दाल और चावल को पत्थर के सिल और बट्टे के बीच में रखकर पीसा जाता और खाने के स्वाद में मिट्टी का हल्का स्वाद भी शामिल हो जाता, जिससे रसोई घर की महक और खाने की थाली की खुशबू भी बढ़ जाती। जिस प्यार और मेहनत के साथ पसीना बहाकर घर की महिलाएं खाना बनाती, वैसा स्वाद मिक्सर में आना न के बराबर है। आप खुद ही एक बार यह पड़ताल करके देख सकती हैं कि मिक्सर में पीसी हुई चटनी और सिल-बट्टा पर पीसी हुई चटनी का स्वाद काफी अलग होता है।

ब्लैंडर से पहले मथनी

मिक्सर की तरह पहले हमारे जीवन में ब्लैंडर भी नहीं था। दाल को पतला करने के लिए या फिर दही से छाछ और लस्सी बनाने के लिए मथनी का इस्तेमाल किया जाता। लकड़ी की मथनी को दोनों हथेलियों के बीच में रखकर आगे और पीछे की तरफ सरकाया जाता और इससे पतीले में रखा हुआ सामान बारीक होता। हालांकि इसमें काफी मेहनत लगती लेकिन स्वाद लाजवाब आता।

पंखा और एसी से पहले गिला कपड़ा



भीषण गर्मी होने पर पंखा और एसी का इस्तेमाल राहत देता है। लेकिन इससे पहले देसी एसी हर घर में तैयार किया जाता, जो कि गर्मी में काफी राहत देता। एक तौलिया या चादर को ठंडे पानी में भिगोकर और उसका पूरा पानी निकालकर निचोड़ लिया जाता। इस गीले कपड़े को पंखे के सामने टांगा जाता या फिर पीछे रखा जाता। पंखा चलने पर हवा कपड़े की नमी को सोख लेता है। पूरा कमरा ठंडा हो जाता है। कई बार दरवाजे और खिड़की पर गीले परदे या चादर लटकाने से बाहर से आने वाली गर्म हवा भी ठंडी हो जाती है। 





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