वे बातें जो हम यह सोच कर पुरानी मान लेते हैं कि यह ओल्ड फैशन्ड हैं, दरअसल, वहीं आपको जीने का असली फलसफा सिखाती हैं। आइए जानें दादी-नानी की वे आदतें, जो हमें दोबारा अपना लेना चाहिए।
सुबह उठते तुलसी पत्ता और हेल्दी चाय

दादी-नानी मां हमेशा ही सुबह उठते पहले एक गिलास गर्म पानी पीती थीं और हमें भी देती थीं और फिर कुछ पत्ते तुलसी के अपने मुंह में काली मिर्च के साथ लेती थीं और वह भी मिट्टी के बर्तन में पानी पीती थीं या ताम्बे के, क्योंकि दोनों ही उनके शरीर को ठंडक पहुंचाता था। आज के दौर में जब हम सस्टेनबिलिटी को एक फैशन या ट्रेंड के रूप में देखते हैं, किसी दौर में हमारी दादी-नानी की यह नियमित दिनचर्या हुआ करती थी और हमें इस प्रैक्टिस को दोबारा अपनाना चाहिए। साथ ही साथ उस समय चाय बनाना भी एक कला और एक श्रद्धा का रूप माना जाता था, चाय कोई टी बैग डिप करने वाली प्रक्रिया नहीं थीं, बल्कि तुलसी, लौंग, मिर्च, दालचीनी और अदरक डाल कर धीमी आंच पर पकने को छोड़ा जाता था और चायपत्ती को प्लांट्स में डाला जाता था, क्योंकि उनके पोषण के लिए अच्छा था, उस दौर में दादी-नानी चीजों को बर्बाद करने में यकीन नहीं करती थीं।
सूर्य नमस्कार और प्रकृति से जुड़ना

हमें अच्छी तरह से याद होना चाहिए कि किस तरह से हमारी दादी या नानी हमें सूर्य नमस्कार करने और कुदरत को थैंक्स या धन्यवाद कहने को कहती थीं सुबह-सुबह और फिर हमें बागीचे में लेकर जाती थीं कि हम अच्छे से प्रकृति से जुड़ पाएं और हमें प्यारी-प्यारी प्रकृति से जुड़ीं राइम्स भी सुनाया करती थीं। फिर प्रकृति ने हमें क्या-क्या दिया है इसकी कहानियां भी सुनाया करती थीं। इसलिए अब हमें अपने नए जेनेरेशन को कुछ ऐसी ही ट्रेनिंग दोबारा से देनी चाहिए और उन्हें भी इस महत्व को समझाने की कोशिश करनी चाहिए।
किचन के कपड़े

उस दौर में किचन रोल्स या टिश्यूज का इस्तेमाल करके कागज की अत्यधिक बर्बादी नहीं कराई जाती थी, बल्कि उस वक्त मुस्लिन क्लोथ्स या कॉटन के कपड़े इस्तेमाल होते थे और गंदगी साफ करने के बाद हर दिन उसकी धुलाई और सुखाई करके फिर से इस्तेमाल किये जाते थे, ताकि अधिक पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। जो गिलास के जार, जिनमें जैम, बिस्किट या बाकी चीजें आती थीं, उसमें राशन भरा जाता था न कि प्लास्टिक के डिब्बों या जार में। वे भले ही थोड़े खराब हो जाएं, लेकिन उनका इस्तेमाल किया जाता है, वे आउटडेटेड नहीं होते थे, हमें भी फिर से उस हैबिट को दोहराने की जरूरत है।
लोकल मंडी से सब्जी

उस दौर में क्योंकि ऑनलाइन शॉपिंग नहीं होती थी, सबकुछ हेल्दी खाने को मिलता है, दादी-नानी फ्रिज में सब्जी स्टोर करके नहीं रखती थीं, बल्कि हर दिन सब्जियां खरीदने लोकल बाजार या सब्जी मंडी में जाया करती थीं और फिर उन्हें खाया भी करती थीं और फ्रेश बनाने में यकीन रखती थीं, एक समय का खाना दुबारा नहीं रखती थीं, वहीं रात का बचा खाना भी नहीं रखती थीं, जितने की जरूरत बस उतना ही बनता है, आटा भी कभी गूंथ कर नहीं रखती थीं। सब्जी अपने पल्लू में नहीं तो कपड़े के झोले में रखने के लिए इस्तेमाल करती थीं। हमें फिर से यह तरीका अपने जीवन में अपनाने की कोशिश तो जरूर करनी चाहिए।
मल्टी पर्पस काम

एक और महत्वपूर्ण काम जो दादी-नानी करती थीं कि उनके लिए कोई एक समान कई काम करने वालों के बराबर होता था। अगर वह एक जार खरीदती थीं, तो उसको कई तरह के मल्टी पर्पस कामों में इस्तेमाल करती थीं, अगर नारियल तेल खरीदा है, तो वह ब्यूटी कॉन्सेप्ट्स में ही इस्तेमाल होता था, तो बालों के तेल या मालिश के लिए भी इस्तेमाल होता था, अगर एक बार पानी में क्लीनिंग डिटर्जेंट मिलाया तो उससे और भी बाकी के काम पूरे किये जाते थे। साड़ियां अगर पुरानी हो गई हैं, तो उससे कई तरह की चीजें बनाई जाती थीं, वहीं अगर कुछ ऐसे सामान जो रात में बच गए हैं, उनसे सुबह में कुछ नयी चीज क्रिएट करने की कोशिशें किया करती थीं।