यह बेहद जरूरी है कि जब आप पेरेंट्स बनते हैं, तो हर कदम पर जिम्मेदारियां बांटिए, ताकि दोनों की मानसिक स्थिति न बिगड़े। आइए जानते हैं विस्तार से।
क्या है मेंटल लोड शिफ्टिंग पेरेंटिंग

पेरेंटिंग में मानसिक बोझ को सचमुच कम करने के लिए आपको यह समझना होगा कि आपको किस तरह से काम करना है, इसके लिए आपको सिर्फ काम नहीं बांटना है, बल्कि काम बांटने से आगे बढ़कर, काम की पूरी जिम्मेदारी दूसरे को सौंपनी होगी। साथ ही जब एक पेरेंट मैनेजर की तरह काम करता है और दूसरे को याद दिलाता रहता है कि क्या करना है, तो असल में सारा मानसिक बोझ उसी पर बना रहता है। इससे मेंटल लोड बढ़ता है और यह बेहद जरूरी है कि मेंटल लोड शिफ्टिंग पर काम किया जाये।
क्या हो सकती है कोशिश
इस दबाव या लोड को अपने तरीके से हैंडल किया जा सकता है, इसके लिए CPE फ्रेमवर्क (Conception, Planning, और Execution पर ध्यान देने की कोशिश करनी चाहिए। तो यह तय करने की कोशिश करें कि कोई एक व्यक्ति किसी काम की पूरी जिम्मेदारी शुरू से आखिर तक ले। साथ ही Conception यानि सोचना, यह समझना कि कोई काम करने की जरूरत है, इस सोच को लाने की जरूरत है। वहीं फिर बात आती है कि काम के अनुसार और काम कब पूरा करना है, इसकी योजना बना कर उसे एक्सीक्यूट करने की कोशिश करनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि सभी को अपना काम खुद करने दें, हर काम में खुद को शामिल करने की जरूरत नहीं है।
माहौल रहेगा अच्छा

माता-पिता की जिम्मेदारियों को आपस में बांटने से एक संतुलित और कम तनाव वाला माहौल बनता है, जिससे थकान या बर्नआउट से बचाव होता है और एक मजबूत और बराबरी वाली साझेदारी को बढ़ावा मिलता है। इससे बच्चों की देखभाल लगातार और संतुलन के साथ अच्छी बनी रहती है और उन्हें खुद भी टीमवर्क और जीवन के जरूरी हुनर सीखने को मिलते हैं और माता-पिता को उनके सामने सहानुभूति, सहयोग और सम्मानजनक व रूढ़ियों से मुक्त भूमिकाओं का उदाहरण पेश करने का मौका मिलता है।
कम तनाव और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य
जब दोनों पार्टनर घर के काम और बच्चों की देखभाल में हाथ बंटाते हैं, तो किसी पर भी काम का ज्यादा बोझ नहीं पड़ता और न ही किसी को कोई शिकायत होती है। इससे ‘डिफॉल्ट पेरेंट’ सिंड्रोम से बचा जा सकता है। साथ ही जिम्मेदारियां बांटने से परिवार के सदस्य एक-दूसरे के और करीब आते हैं, जिससे घर में एकता और टीम वर्क की भावना बढ़ती है। बच्चे अपनी आंखों से देखते हैं कि लिंग या भूमिकाएं यह तय नहीं करतीं कि कड़ी मेहनत कौन करेगा। वे सीखते हैं कि साझेदारी का मतलब टीमवर्क है, न कि कोई ऊंच-नीच।
सकारात्मक रोल मॉडल
इस बात का ख्याल रखना बेहद जरूरी है कि बच्चे देखकर सीखते हैं। इसलिए जिम्मेदारियां बांटने से उन्हें यह सीख मिलती है कि हर काम जरूरी होता है, और पुरुष महिला में कोई फर्क नहीं होता है, सबको मिल कर काम करने की कोशिश करनी चाहिए। और इससे बच्चों में भी मानसिक विकास होता है और आत्मनिर्भरता बढ़ती है, साथ ही बच्चों को घर के कामों में शामिल करने से उनमें जिंदगी के लिए जरूरी हुनर, जिम्मेदारी की भावना और दूसरों के प्रति हमदर्दी पैदा होती है। साथ ही दोनों माता-पिता मिलकर और सक्रिय रूप से बच्चों की परवरिश करते हैं, तो उन्हें ज्यादा एक जैसा अनुशासन और भावनात्मक सहारा मिलता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत जरूरी है।
समय और कार्य-कुशलता

एक खास बात यह भी होती है कि कामों को आपस में बांटने से घर का प्रबंधन बेहतर हो जाता है और अधिक कुशल हो जाता है, जिससे परिवार के साथ समय बिताने, अपनी रुचियों को पूरा करने और अपनी देखभाल करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता है। यही नहीं माता-पिता और बच्चे के बीच मजबूत रिश्ता भी बनता है और जब माता-पिता दोनों मिलकर बच्चे को नहलाने, सुलाने और स्कूल छोड़ने जैसे काम करते हैं, तो वे दोनों ही बच्चे के साथ अपनी अलग और खास यादें बनाते हैं और उसके साथ विश्वास का रिश्ता कायम करते हैं।
समानता का एहसास
किसी भी रिश्ते को इससे ज्यादा तेजी से कोई चीज खत्म नहीं करती, जब एक व्यक्ति खुद को 'मैनेजर' और दूसरा खुद को 'असिस्टेंट' समझने लगे। रिश्ते में यह बहुत दरार लाती है सोच। इसलिए जिम्मेदारियां आपस में बांटने से रिश्ते में बराबरी का एहसास बना रहता है। जब आप दोनों एक ही बात पर सहमत होते हैं, तो कमरे में कौन-सा माता-पिता मौजूद है, इस आधार पर नियम नहीं बदलते। इससे बच्चों को ज्यादा सुरक्षित महसूस होता है। साथ ही पर्सनल ग्रोथ के लिए भी यह बेहद जरूरी है।