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home / engage / रिलेशनशिप्स / पेरेंटिंग

दोस्त बनेंगे पेरेंट्स, सख्त पेरेंटिंग का गया जमाना

टीम Her Circle |  May 22, 2026

वह दौर गया, जब आप बच्चों के स्ट्रिक्ट यानि सख्त पैरेंट बन कर बच्चों की अच्छी पेरेंटिंग कर लेते थे, अब तो दोस्त बनना बेहद जरूरी है और पैरेंटिंग के इस दौर में यह बदलाव खूब हुआ है। आइए जानते हैं विस्तार से। 

आधुनिक पेरेंटिंग की नयी परिभाषा 

आधुनिक पेरेंटिंग पारंपरिक, सत्तावादी सख्ती से हटकर एक दोस्ताना वाले रिश्ते की ओर बढ़ रही है। माता-पिता बिना किसी सवाल के आज्ञा मनवाने की बजाय, खुलकर बातचीत, भावनात्मक जुड़ाव और आपसी सम्मान को सक्रिय रूप से प्राथमिकता दे रहे हैं। गौरतलब है कि इन दिनों इस बात को लेकर व्यापक जागरूकता है कि अत्यधिक सख्त परवरिश से तनाव बढ़ सकता है और परेशानी आ सकती है। इसे सकारात्मक पालन-पोषण का भी जरिया मान लिया गया है, क्योंकि यह तरीका भावनात्मक बुद्धिमत्ता, तर्क-वितर्क और एक सुरक्षित माहौल बनाने पर जोर देता है, जहां बच्चे अपनी मुश्किलों को साझा करने में सहज महसूस करते हैं। आजकल के माता-पिता चाहते हैं कि वे अपने बच्चों के साथ घुल-मिलकर रहें, ताकि बच्चे अपनी गलतियां छिपाने के बजाय मार्गदर्शन के लिए उन्हीं के पास आएं। 

बेहतर बातचीत

अगर बेहतर बातचीत की बात करें, तो बच्चे उन माता-पिता पर ज्यादा भरोसा करते हैं, जिन पर उन्हें विश्वास होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जहां ज्यादा भावनात्मक समझ होती है, वहीं पर बेहतर बातचीत की भी उम्मीद की जाती है और एक मददगार माहौल में पले-बढ़े बच्चे दूसरों की भावनाओं को समझना और खुद पर काबू रखना सीख पाते हैं और इसकी वजह से लंबे समय तक चलने वाले मजबूत रिश्ते बन पाते हैं। साथ ही यह रिश्ता अक्सर बड़े होने पर एक स्वस्थ, जिंदगी भर चलने वाली दोस्ती में बदल जाता है।

फिर सीमा, सीमा नहीं लगती 

इस बात को समझना जरूरी है कि जब माता-पिता सिर्फ दोस्तों की तरह पेश आते हैं, तो बच्चों को दुनिया में आगे बढ़ने के लिए जरूरी ढांचा और अनुशासन नहीं मिल पाता। साथ ही माता-पिता के अधिकार का कम होना भी नजर आता है, बच्चे सीमाओं को गंभीरता से नहीं लेते, जिससे जब सख्ती से नहीं कहने की जरूरत होती है, तो वे उसका विरोध करते हैं। वहीं बच्चे अपने साथियों जैसी गहरी स्वीकृति के लिए माता-पिता पर निर्भर हो जाते हैं, जिससे उनकी आजादी दब सकती है।

चाइल्ड साइकोलॉजी क्या कहता है 

चाइल्ड साइकोलॉजी मतलब बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ इस बात पर काफी हद तक सहमत हैं कि सबसे असरदार तरीका वह है जिसमें इन दोनों का मेल हो। यह तरीका बच्चों को भरपूर स्नेह और भावनात्मक सहारा देकर, दोस्त और माता-पिता के बीच की दूरी को पाट देता है। साथ ही, यह स्पष्ट और अटल सीमाएं और नियम भी बनाए रखता है।

तरीके के अंतर को समझें 



गौरतलब है कि अनुशासन तो सारे ही पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ रखना चाहते हैं, लेकिन दोनों के ही तरीके में काफी अंतर होता है, जैसे कि सख्त माता-पिता सजा का इस्तेमाल करते हैं, तो वहीं मिलनसार माता-पिता तार्किक नतीजों और सिखाने के मौकों का इस्तेमाल करते हैं। जैसे कि सख्त माता-पिता एकतरफा आदेश देते हैं। वहीं मिलनसार माता-पिता दोतरफा बातचीत करते हैं। जहां तक बात है कि सख्त माता-पिता आज्ञा मानने की मांग करते हैं, वहीं मिलनसार माता-पिता नियमों के पीछे का कारण समझाते हैं।




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