पेरेंटिंग का क्या तरीका सही होता है और क्या गलत, यह खासतौर पर बच्चों के साथ माता-पिता पर भी निर्भर करता है। इन दिनों फाफो पेरेंटिंग काफी चलन में है। फाफो पेरेंटिंग का मतलब खासतौर पर बच्चों को अपने पैरों में खड़ा होना सिखाती है। बच्चे अपने सभी काम और छोटी गलतियों से सीखते हैं कि हर काम का एक नतीजा होता है। इसका मतलब यह होता है कि बच्चों का ऐसा पालन-पोषण होता है, जहां पर बच्चों को उसके कामों के स्वाभाविक परिणाम महसूस करने दिए जाते हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
जानें क्या है फाफो पेरेंटिंग

फाफो पेरेंटिंग का मतलब होता है कि बार-बार बच्चों को डांटने की बजाय समझाने की जरूरत होती है। उसके काम का जो परिणाम होता है, उसे बच्चों को समझने देने के लिए समय देना होता है। इस बात का ध्यान दें कि होमवर्क न करने पर स्कूल में डांट पड़ना या नंबर कम आना होता है। यह बच्चे की सीख बनती है। अगर बच्चा ठंड के मौसम में जैकेट नहीं पहनता, तो उसे कुछ देर के लिए ऐसे रहने दें और उसे अहसास होने दें कि ठंड है और इसके बाद बच्चा खुद जैकेट पहनता है।
फाफो पेरेंटिंग की लोकप्रियता की वजह

फाफो पेरेंटिंग की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि इससे बच्चे जिम्मेदार बनते हैं। साथ ही माता-पिता से डरते नहीं है, बल्कि दोस्ती का रिश्ता कायम होता है। समझ के साथ माता-पिता की बात सुनने और समझने की सीख मिलती है। बच्चों में फैसले लेने की क्षमता बढ़ती है और साथ बच्चे अनुशासन भी सीखते हैं। माता-पिता के लिए भी बदलते वक्त के साथ पैरेंटिंग आसान होने लगती है।
ध्यान रखने वाली बातें

फाफो पेरेंटिंग में ध्यान रखने वाली बातें यह होती है कि बच्चों के साथ-साथ हर फैसले में खड़ा होना है। आपको बच्चों पर ध्यान रखना है कि किसी भी तरह का परिणाम उन्हें नुकसान न पहुंचाएं। साथ ही अगर कोई परिणाम बच्चों के खिलाफ भी जाता है, तो यह समझना होगा कि आपको इस दौरान बच्चों को समझ कर लेना है और उन पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालना है। आपको हर हालात में बच्चे के साथ भावुकता वाला रिश्ता बनाकर रखना है।
सही पेरेंटिंग से जुड़ी बातें

अगर बच्चों को सिर्फ प्यार देंगे, तो बच्चा बिगड़ सकता है। अगर सिर्फ अनुशासन देंगे, तो बच्चा डर भी सकता है। सही पेरेंटिंग का मतलब प्यार और अनुशासन का संतुलन रखना होता है। आपको बच्चों की भावनाओं को स्वीकार करना है। जहां पर बच्चों को 'मत रो' की जगह 'मैं समझता हू' कि तुम परेशान हो' यह कहना चाहिए। जब भी बच्चा बात शेयर करता है, तो उसे जज न करें। अगर आप बच्चों के लिए कोई नियम बनाती हैं, तो उसे कठोर न करें।
बच्चों से सम्मानजनक भाषा में बात करें

आपको बच्चों से सम्मानजनक भाषा में बात करना है। ध्यान दें कि बच्चा वही सीखता है, जो वह देखता है। घर में चिल्लाना, ताने मारना या गाली देना आपके बच्चों को भी यही सीख देता है। हमेशा बच्चों के साथ लचीलापन बनाकर रखें। बच्चों को किसी भी तरह की मुश्किल सजा न दें। सजा बच्चों में डर को पैदा करता है। आपको अपने बच्चों की तुलना किसी अन्य से नहीं करनी है। अगर आप तुलना करती हैं, तो बच्चा खुद को कमजोर समझने लगता है।