ऐसे दौर में जब लोग किसी से मिलने की जगह, सोशल मीडिया पर मिल लिया करते हैं, फिर भी क्रिसमस और नए साल के मौके पर अगर वे आपस में मिल-जुल रहे हैं, तो समझिए मिलने-मिलाने का सिलसिला जारी रखना जरूरी है। आइए जानें विस्तार से।
मिलने के बहाने काफी बातें

मिलने के बहाने इसलिए भी ढूंढने जरूरी हैं, क्योंकि अब लोगों ने डिजिटल दौर में केवल ऑनलाइन एक दूसरे से मिलना शुरू कर दिया है, अब कोई इतनी मेहनत या मशक्कत करना नहीं चाहते हैं, ऐसे में खुद लोगों से मिलना-जुलना कम हुआ है और लोग केवल फोन और इन चीजों के माध्यम से ही आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। आपस में एक संपर्क भी टूट-सा गया है। इसलिए भी यह जरूरी है कि मिलने-मिलाने की प्रक्रिया जारी रहे और लोग आपस में घुल-मिल कर बातें करें और काम करें। मिलने के बहाने इसलिए भी ढूंढने जरूरी हैं, क्योंकि ऐसी कई बातें हैं, जिन्हें केवल फोन या टेक्स्ट के बहाने समझाना कठिन है, इसलिए भी इसके बारे में सोचने की कोशिश करनी चाहिए और मिलने के बहाने तलाश करने चाहिए।
मिलती है लंबी उम्र
यह बात मानना ही होगा कि जिन लोगों के सोशल रिश्ते मजबूत होते हैं, उनके कमजोर रिश्तों वाले लोगों की तुलना में जिंदा रहने की संभावना 50 प्रतिशत ज्यादा होती है। यह भी पाया गया है कि सोशल आइसोलेशन से होने वाले जोखिम उतने ही गंभीर हो सकते हैं, जितने कि धूम्रपान या शराब पीने से होते हैं, क्योंकि नियमित रूप से मेलजोल रखने से ब्लड प्रेशर कम होता है और हाइपरटेंशन का खतरा कम होता है। साथ ही पॉजिटिव सोशल कॉन्टैक्ट से एंडोर्फिन रिलीज होते हैं और स्ट्रेस से होने वाली सूजन कम होती है, जिससे शरीर वायरस से ज्यादा असरदार तरीके से लड़ पाता है। वहीं बड़े-बुजुर्गों के लिए, सोशल इंटरेक्शन दिमाग की एक्टिविटी को बढ़ाता है, जिससे याददाश्त में कमी और डिमेंशिया जैसी बीमारियों को दूर भगाने में मदद मिलती है। और इन सबके लिए न्यू ईयर के गेट टुगेदर से अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता है, इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि आप जरूर अपने रिश्ते मजबूत करें और मिलने-मिलाने का सिलसिला जारी रहे।
रिश्तों को मजबूत बनाना

अपनी परम्पराओं को बरकरार रखने के लिए और छुट्टियों का सही इस्तेमाल करने के लिए भी कॉफी के लिए रेगुलर मिलना-जुलना, उन रिश्तों को बनाए रखने में मदद करता है जो शायद वरना कमजोर पड़ जाएं। वहीं कई बार जब आप मेसेज में बातें करते हैं या करती हैं, तो आपके बीच गलतफहमियां भी आ जाती हैं, उन्हें सुलझाने की कोशिश करने के लिए भी आपस में मिलते रहना जरूरी होता है। इससे आपको भी यह फीलिंग आती है कि आपके साथ कौन से लोग हैं और कौन से नहीं हैं। साथ ही साथ मिलने से परिवारों और दोस्तों को बातचीत, सहानुभूति और समस्या-समाधान का अभ्यास करने के लिए एक न्यूट्रल जगह मिलती है। यही नहीं पारिवारिक समारोहों से नई पीढ़ियों को बड़ों से मूल्य और दृष्टिकोण सीखने का मौका मिलता है, जिससे साझा इतिहास की भावना बढ़ती है।
एक दूसरे के बारे में नयी बात
कई बार फोन पर बातचीत होने से आप इस बात का अनुमान नहीं लगा पाते हैं कि एक इंसान में क्या-क्या खूबी हो सकती है। या उनकी किसी खास खूबी के बारे में हमें शायद ही पता होता है। ऐसे में जब हम उस इंसान से आमने-सामने मिलते हैं, तो उनके बारे में और बेहतर जान पाते हैं। इसलिए बेहद जरूरी है कि हम गंभीरता से इस बारे में सोचें और हमेशा मिलने-मिलाने पर यकीन करें और कोशिशें करें। इससे काफी बदलाव होता आप खुद अपनी निजी जिंदगी में देखेंगे।
अच्छा खान-पान

जब आप त्योहारों के दौरान मिलते हैं, तो बातचीत के साथ-साथ अच्छा और नया खान-पान भी अच्छे से एक्सप्लोर करते हैं और इससे काफी मजा भी आता है कि आप अच्छा खान-पान कर पाती हैं। नए तरीके की चीजें एक्सप्लोर होती हैं और नयी मेमोरी भी बनती है, इसलिए भी बेहद जरूरी है कि मिलना-मिलाना चलता रहे और फिर लोग एक दूसरे के साथ बैठ कर अपनी दुःख-सुख की बातें शेयर कर सकें। जब आप साल में कम से कम त्योहारों के दौरान मिल कर खाना खाते हैं, तो वो मौका आपके लिए खास बन जाता है, क्योंकि जब आप अपने प्यारे लोगों के साथ खाना खाते हैं, तो यह मौका अपने आप में खास बन जाता है, इस मोमेंट को खास बनाने के लिए क्योंकि आप टेबल सजाते हैं और एक-दूसरे और अपने रिश्ते को सेलिब्रेट करने के लिए अपने सबसे अच्छे डिनरवेयर का इस्तेमाल करते हैं और यह बेहद अच्छी वाइब्स देता है। फिर चाहे ब्रंच हो, लंच हो या डिनर, कुछ ऐसा बनाने की कोशिश करें जो आपको पता हो कि उन्हें पसंद आएगा। आप चाहें, तो सबके साथ मिल कर मील तैयार करें और बातचीत करती रहें, इसका भी एक अपना मजा आता है। साथ ही, खुद से और अपने प्रियजनों से वादा करें कि आप खाने के समय 'स्क्रीन-फ्री' रहेंगे ताकि आप सच में मौजूद रहें और अपनी बातचीत का आनंद ले सकें।
बातचीत का लंबा सिलसिला
किसी खास मौके पर भी जब आप मिलती हैं अपने किसी भी करीबी से, तो सामने रहने पर आप ऐसी कई बातें शेयर कर देती हैं, जो कि आपके लिए फोन पर बताना संभव नहीं होता है और फिर आपका ही दिल एकदम से थोड़ा हल्का हो जाता है। इसलिए भी जरूरी है कि बातचीत का सिलसिला सही तरीके से चलता रहे और मिलते रहना उससे भी ज्यादा जरूरी है। हर्ड इम्यूनिटी
दोस्ती और इम्यूनिटी के बीच का संबंध सिर्फ बुजुर्गों तक ही सीमित नहीं है। एक स्टडी में 334 लोगों को एक ऐसे वायरस के संपर्क में लाया गया जिससे आम सर्दी-जुकाम होता है। जिन लोगों के सोशल बॉन्ड सबसे मजबूत थे, उनमें वायरस के प्रति सबसे ज्यादा रेसिस्टेंस दिखा। बेसलाइन इम्यूनिटी, हेल्थ मेंटेनेंस और स्ट्रेस जैसे फैक्टर्स से टेस्ट किए गए लोगों के रेसिस्टेंस लेवल में कोई बदलाव नहीं आया। यह भी देखा गया है कि सपोर्टिव पर्सनल रिलेशनशिप स्ट्रेस को कम करते हैं। इससे, कमजोर इम्यूनिटी का खतरा भी कम होता है। स्ट्रेस कम होने से यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि जिन लोगों के सपोर्ट नेटवर्क मज़बूत होते हैं, उनके घाव जल्दी क्यों भरते हैं। इसके उलट, इस तरह के क्लिनिकल ट्रायल से पता चलता है कि सोशल आइसोलेशन और कमजोर इम्यून सिस्टम के बीच संबंध है। अकेलापन दरअसल, आपके व्हाइट ब्लड सेल्स के व्यवहार को भी बदल सकता है, जिससे सूजन बढ़ सकती है और शरीर का इम्यून रिस्पॉन्स कम हो सकता है। इसलिए मिलने-मिलाने का दौर बिल्कुल खत्म नहीं करना है।