जब भी गर्मी की छुट्टियां आती हैं, पुराने दिन जरूर याद आ जाते हैं, उस वक्त ट्रैवलिंग का मतलब कुछ अलग ही होता था। आइए याद करते हैं उन दिनों को कि हम किस तरह से करते थे ट्रैवल।
प्लानिंग होती थी टॉप लेवल

गर्मियों के महीने में सबसे ज्यादा इंतजार रहता था, तो इस बात का कि कैसे भी गर्मियों की छुट्टियां आ जाएं, ताकि घूमने-फिरने की तैयारी हो। उस दौर में घूमने जाने का मतलब केवल डेस्टिनेशन तक पहुंचना नहीं था, बल्कि बहुत सारी बातों को सहेज लेना था। ट्रेन से ट्रैवलिंग के लिए पूरी तैयारी की जाती थी। न सिर्फ खान-पान, बल्कि सबके पास अपनी-अपनी ठंडे पानी की बोतल होती थी। यही नहीं अचार और पराठे की खुशबू की महक के बगैर कोई भी यात्रा पूरी नहीं होती थी। यही नहीं स्टेशन या फ्लाइट की भीड़ से पहले, मम्मी ने घर से ही आलू-पूरी या आम के अचार के साथ पराठे पैक किए थे। वो अखबार या पन्नी में लिपटे पराठे का स्वाद भी कुछ अलग-सा था।
ट्रेन का सफर का अपना मजा होता था

अगर हम अपर बर्थ की बात करें, तो ट्रेन में अपर बर्थ में काफी मजा आता था, क्योंकि वहां ऊपर कुछ घंटों के लिए अपना साम्राज्य हो जाता था और वहां बैठ कर खूब मस्ती होती थी और खाने-पीने का जो मजा आता था, उसकी तो एक अलग ही बात होती थी। अपर बर्थ की लड़ाई, तो हमेशा ही होती और ट्रेन में जाते ही पहला सवाल यही होता था कि अपर बर्थ किसकी है? इंजन की सीटी और वो छुक-छुक की आवाज कमाल कर जाती थी, वहीं नानी के घर या दादी के घर जाने की खुशी का अपना मजा होता था। और ट्रेन में सफर करने से ज्यादा स्टेशन जाने पर तरह-तरह की चीजें खाने का भी अपना मजा होता था। साथ ही चाय-गरम, चाय-गरम की आवाज से नींद खुलना और हर स्टेशन पर आवाज आती तो उसकी भी ख़ुशी होती थी। स्टेशन के स्टॉल से चंपक, नंदन, चाचा चौधरी या टिंकल खरीदना सफर की सबसे बड़ी खास बात होती थी। साथ ही सिर्फ परिवार ही नहीं, कभी-कभी तो पूरी ट्रेन का डब्बा ही अंताक्षरी खेलने लगता था। और विंडो सीट का अपना मजा होता था। साथ ही बिना हेडफोन के, बस बाहर के खेत और पेड़ गिनना ही बेस्ट टाइमपास था।
दोपहर का खेल

फिर ट्रेन का मजा लेकर और रोमांचक यात्रा करके जब दादी-नानी के घर पहुंचते थे, तो वहां भी काफी मजे करते थे और गर्मी से बचने के लिए नानी सारे परदे गिरा देती थी और कमरा ठंडा रखती थी। हम बच्चे वहां छुप्पन-छिपाई करते थे और लूडो, या सांप-सीढ़ी खेलते थे। साथ ही चोरी-छुपे धूप में निकाल कर पेड़ से कैरी तोड़ना और फिर नानी से छुपा कर नमक-मिर्च के साथ खाना, इन सब बातों का अपना मजा होता था। फिर नानी वापस आने पर शर्बत और तरबूज और कुछ मजेदार स्नैक्स खाने को देती थीं। नानी-दादी के घर ही एक बड़ी सी बाल्टी में आमों को डाल कर सब साथ में खाते थे और बड़ा मजा आता था।
छत पर खेलना

दिन की पूरी मौज-मस्ती करने के बाद, रात में पूरे घर पर पानी छिड़का जाता था और फिर मिट्टी की वो भीनी-भीनी खुशबू आती थी और मौसम ठंडी हो जाती थी। साथ ही लाइन से सबके गद्दे लगना और खुले आसमान के नीचे तारे गिनते-गिनते सोना। फिर सोते वक्त नानी के हाथ से पंखा झलना और पुराने जमाने की कहानियां या राजा-रानी की कहानियां सुनाना, इससे अच्छी यात्रा और क्या होंगी।
भाई-बहन की मस्ती

किसी भी कैफे में जाकर केवल कुछ पल की कॉफी पीकर आनंद लेने वाले शायद ही इस बात को समझ पाएंगे कि भाई बहन की जो बॉन्डिंग इन यात्राओं में होती थी, जिस तरह से सब पास में स्ट्रीट फूड एन्जॉय करते थे और भी कई चीजें एन्जॉय करते थे। सारे मामा-मौसी के बच्चे एक साथ होना। हर बात पर लड़ाई होना और फिर 5 मिनट में दोस्ती हो जाना। जब दोपहर में कुल्फी वाले की घंटी बजती थी, तो नानी से पैसे मांग कर खाना और कई चीजें एक्सप्लोर करना, इन यात्राओं का अपना मजा होता था।