बच्चों के लिए बेहद जरूरी है कि अगर वे पेरेंट्स के साथ कहीं जाएं, तो मेमोरी के लिए किसी कैमरे पर नहीं, बल्कि अपने दिल और दिमाग पर भरोसा करें। आइए जानते हैं विस्तार में।
असली दुनिया है खूबसूरत

हम इस बात से अनजान रहते हैं, लेकिन कब हमारी मोबाइल देखने और दिखाने की आदत और किसी भी जगह के मोमेंट्स को सहेजने की जो कला है, उसे हम सेल्फी में या कुछ भी देखते, उसे बस कैमरे में कैद करने की कोशिश करते हैं, जबकि अगर आपको एक्सप्लोर करने की कोशिश करनी है, तो आपके लिए बेहद जरूरी है कि आप विज्ञान की मानें और बच्चे को एक्सप्लोर करने का सही तरीके से मौका दें और उसके लिए उन्हें खुली आंखों से दुनिया देखनी होगी, महसूस करना होगा, मेमोरीज बनाने का मतलब केवल कैमरे में फोटो या वीडियो निकाल लेना भर नहीं है, बल्कि हमें इस बात का ख्याल रखना ही होगा कि वे उस जगह की वास्तविकता को समझ पाएं। असली दुनिया की खूबसूरती दिखाएं उन्हें।
क्या कहता है विज्ञान
यह विज्ञान ही कहता है कि बच्चे को आप बाहर जितना ले जायेंगे और मेमोरीज सहेजने की कला सिखाएंगे, उतनी ही अधिक बच्चे की याददाश्त बेहतर होती है और स्टडीज से पता चलता है कि फोटो लेने से असल में फोटो लेने से जुड़ी कमी का असर यानी कि photo-taking impairment effect होता है, यानी दिमाग चीजों को यह सोच कर याद नहीं रखता है कि चलो बाद में कैमरे में तो है, देख लेंगे और फिर आपका दिमाग उन चीजों को याद नहीं रख पाता। मेमोरीज के नाम पर फिर सिर्फ कैमरे की मेमोरीज भरती है और असल डिटेल्स इंसान भूल जाता है। इसलिए बच्चे को जरूर सिखाएं कि वह कहीं जाएं, तो मोमेंट्स को एन्जॉय करें। एक बात का आपको और खास ख्याल रखना है कि बच्चों का आंखों और दिमाग का असली कनेक्शन होता है। इसलिए बच्चे जब अपनी आंखों का इस्तेमाल बिना कैमरा के करेंगे, तो वे अपनी आंखों से किसी शानदार पहाड़ या ऐतिहासिक स्मारक को देखने पर दिमाग उसके आकार, गहराई और साफ रंगों को सही ढंग से समझ पाएंगे। साथ ही लगातार फोटोग्राफी करने से बच्चे का ध्यान बंट जाता है, जबकि बिना स्क्रीन की चीजों को एक्सप्लोर करने से वे वर्तमान में बने रहना सीखते हैं।
दूसरों की राय की चिंता से आजादी

आप शायद इस बात का महत्व तब समझ पाएं, जब आपको बच्चे में एक कॉन्फिडेंस नजर आएगा। दरअसल, यह भी अध्ययन में देखा गया है कि सेल्फी लेने से बच्चे का ध्यान इस बात पर चला जाता है कि मैं दूसरों को कैसा दिख रहा हूं, न कि इस बात पर कि उस जगह पर महसूस कैसा हो रहा है और असली खुशी किसी बड़ी कामयाबी या खूबसूरत नजारे का अनुभव करने से मिलती है और वह एकदम अंदरूनी खुशी होती है, जिसे किसी को समझाया या एक्सप्लेन नहीं किया जा सकता है। साथ ही वे बाहरी तारीफ या किसी के (लाइक/कमेंट) से मिलने वाली खुशी पर ध्यान नहीं देते हैं, साथ ही उन्हें एकदम परफेक्ट ट्रिप की तस्वीरों को सहेजने वालीं चिंता भी नहीं होती है और उस प्रेशर में वे ट्रिप पर हर दिन जाने के लिए और नए कपड़े पहनने के लिए, जरूरत से ज्यादा शॉपिंग भी नहीं करेंगे। और इन दबाव के बगैर बच्चे आराम कर पाते हैं और सच में तनाव-मुक्त हो पाते हैं।
सोशल इंटरेक्शन
बेहतर सोशल इंटरैक्शन और कल्चर को करीब से जानना बेहद जरूरी है और यह सब तब होगा, जब बच्चे मोबाइल से दूर एक अलग दुनिया देखेंगे और आस - पास की चीजों को सिर्फ कैमरे में नहीं देखेंगे , लोगों से मिल कर बातें करेंगे और जब बच्चे नजरें उठाकर आस-पास देखते हैं, तो उनके लोकल लोगों से घुलने-मिलने, नई भाषाएं आजमाने और दोस्त बनाने की संभावना ज्यादा होती है। साथ ही साथ जो बच्चे हैं, वे परिवार के साथ गहरे रिश्ते कर पाते हैं, अपने ही परिवार के लोगों को अधिक करीब से समझ पाते हैं, अपने बारे में नै दुनिया क्रिएट कर पाते हैं और ट्रिप के दौरान एक-दूसरे की आंखों में देखकर बात करना और साथ में हंसना-बोलना सीख पाते हैं, फेक चीजों से दूर हो पाते हैं कि इस बात को समझना जरूरी होगा कि सिर्फ ग्रुप सेल्फी के लिए या पोज देने के लिए नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर एक दूसरे का साथी बनना है और साथ ही मदद करना है कि अगर ट्रेवल में कोई साथ हैं और उन्हें आपकी जरूरत है, तो वे खड़े रहें। हर तरह से। यह ग्रुप सेल्फी के लिए पोज देने की तुलना में परिवार के रिश्तों को कहीं ज्यादा मजबूत बनाता है।
मानवता खो देते हैं बच्चे

यह भी एक खास बात हो जाती है कि बच्चे पूर्ण रूप से मानवता खो देते हैं, उन्हें सेल्फी सेलफिश बना देती है। इसलिए इस बात को समझना होगा कि बिना कैमरे के बाहर की ओर देखने से उन्हें यह एहसास होता है कि वे एक विशाल और खूबसूरत दुनिया का एक छोटा, लेकिन उससे जुड़ा हुआ हिस्सा हैं। बच्चे फिर अहंकार से ऊपर मानवता को महत्व देते हैं और वे उन लोगों और जगहों की कहानियों पर पूरा ध्यान देते हैं, जहां वे जाते हैं, न कि इस बात पर कि उनके साथ खड़े होने पर वे कैसे दिखते हैं।