पूर्वी चंपारण के सुंदरपुर में महिलाओं ने चरखे को अपनी आय का जरिया बना लिया है और सामाजिक परिवर्तन के साथ आत्मनिर्भरता के प्रतीक में बदल दिया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी के सुंदरपुर गांव में चरखे की मधुर लय में महिलाएं अपना जीवन बिता रही हैं। देखा गया है कि लगभग हर गली में महिलाएं चरखे पर बैठी सूती धागे से खादी को बनाते हुए दिखाई देती हैं। सुंदरपुर की महिलाओं के लिए खादी केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं है। बल्कि यह खादी उन्हें आय और सम्मान के साथ आत्मनिर्भर बनाने का बल भी प्रदान कर रही है। ज्ञात हो कि कुछ साल पहले सुंदर पुर गरीबी और रोजगार की कमी से जूझ रहा था। कई पुरुष काम की तलाश में पलायन कर जाते थे और महिलाएं घर पर रहा करती थीं।
बदलते वक्त के साथ खादी के जरिए 2 हजार की आबादी वाले इस गांव में 500 महिलाएं खादी का उत्पादन कर रही हैं। इस पूरे मामले को लेकर ग्राम प्रधान राधा देवी कहती हैं कि चरखे ने महिलाओं का जीवन पूरी तरह बदल दिया है। पहले महिलाएं दूसरों पर निर्भर रहती थीं। लेकिन महिलाएं अब खुद कमाती हैं। उल्लेखनीय है कि राधा देवी में ही साल 2018 में सुंदर पुर खादी महिला समूह की स्थापना की, जो अब कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ चुका है।
खादी की यात्रा साल 2015 में शुरू हुई, जब एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन ने 20 महिलाओं को चरखा चलाने का प्रशिक्षण दिया। धीरे-धीरे और भी महिलाएं खास तौर पर गरीब परिवारों की महिलाएं इससे जुड़ती गईं। विधवा रमा देवी ने खादी उद्योग से जुड़ने को लेकर कहा कि उन्हें नया जीवन मिला है। इससे पहले रमा देवी मजदूरी करके केवल 200 रुपए कमाती थीं। लेकिन खादी के जरिए 12 हजार रुपए प्रति माह कमा लेती हैं। इस पूरी खादी योजना में महिलाओं को जिला प्रशासन का भी सहयोग मिला है। 2022 में सौर ऊर्जा से चलने वाली एक आधुनिक खादी प्रसंस्करण इकाई की भी स्थापना की गई है।