पालघर की ट्राइबल या आदिवासी औरतें बीज और बांस से सस्टेनेबल राखियां बना रही हैं और खुद को आत्मनिर्भर बना रही हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
महाराष्ट्र के पालघर में महिलाएं लगातार बेहतरीन काम कर रही हैं। खासतौर से रक्षाबंधन के मौसम में तो इनका काम और बढ़ जाता है, क्योंकि इन्हें बहुत सारे काम मिल जाते हैं। उन्हें नए, पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ बांस और बीज वाली राखियां हाथ से बनाने के लिए काफी पहचान मिली है। बता दें कि 'सेवा विवेक ग्राम विकास केंद्र' और 'केशवसृष्टि' जैसे ग्राउंड लेवल के संगठनों के सहयोग से, विक्रमगढ़ और वाडा जैसे इलाकों की सैकड़ों आदिवासी महिलाओं ने बांस की पारंपरिक बुनाई को कमाई का एक अच्छा मौसमी जरिया बना लिया है। ये राखियां स्थानीय स्तर पर मिलने वाले बांस के टुकड़ों, मुलायम रेशमी धागों और पॉलिश किए हुए लकड़ी के मोतियों से बनाई जाती हैं। खास बात यह है कि इनमें प्लास्टिक या जहरीले केमिकल वाले रंगों का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। इनकी सबसे खास किस्मों में बांस के बीच वाले हिस्से में असली पौधों के बीज लगाए जाते हैं। त्योहार के बाद कचरे में फेंकने के बजाय, इन राखियों को मिट्टी में बोया जा सकता है, जिससे तुलसी, गेंदा, खीरा या हरी मिर्च जैसे पौधे उग सकते हैं।वहीं अपनी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए, महिलाएं अलग-अलग राखी डिज़ाइनों को भारत की पवित्र नदियों, जैसे कावेरी, नर्मदा और यमुना के नाम देती हैं। वहीं कुछ परिवारों के लिए शुरू हुई स्थानीय ट्रेनिंग अब बहुत बड़े स्तर पर पहुँच गई है; ये महिलाएं हर साल 50,000 से ज़्यादा राखियों के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बड़े ऑर्डर पूरे करती हैं। इन आदिवासी समुदायों में खेती काफी हद तक मौसमी बारिश पर निर्भर करती है। राखियां बनाने से उन्हें एक स्थिर और अतिरिक्त आर्थिक आजादी मिलती है। अगर इनकी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखें तो हाथ से बनी इन खास बांस की राखियों का एक जत्था सियाचिन बेस कैंप और लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में तैनात सेना के जवानों को भेजा गया और उन्हें ये राखियां बांधी गयीं। वाकई, इस बार इनकी राखियां खरीदने के बारे में जरूर सोचें।
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