सुई- धागा, आज से नहीं, बल्कि सदियों से महिलाओं के जीवन का सच्चा साथी रहा है। सुई-धागा महिलाओं के लिए जहां कला और कलाकार बनने का सफर तय करता रहा है, वहीं पर बदलते वक्त के साथ महिलाओं का आर्थिक सहारा भी बन गया है। अलीगढ़ की महिलाओं ने भी सुई-धागा से बुनाई का काम कर खुद को आत्मनिर्भर बनाया है। इससे सभी वाकिफ हैं कि कढ़ाई-बुनाई 500 साल पुरानी हस्तशिल्प कला का हिस्सा रही है।
अलीगढ़ की महिलाएं इस कला का बड़ा हिस्सा रही हैं। यहां की महिलाएं इसी कला के बलबूते हर साल लाखों की कमाई कर रही हैं और साथ ही अपने परिवार का पालन-पोषण भी कर रही हैं। इस कला से जुड़ी महिला रुबीना राशिद का कहना है कि उनका सारा काम बिना आर्डर के नहीं होता है। साथ ही जिस तरह से डिमांड होता है, उस तरह से हम काम को करते हैं। रुबीना ने कहा है कि काफी बड़ी तादाद में महिलाएं इस काम से जुड़ी हुई हैं।
रुबीना ने बताया कि इस वक्त उनके साथ 50 से 60 महिलाएं जुटी हुई हैं। उनका कहना है कि 7 से 8 दिन में फूलों और पत्तों के आकार की डिजाइन तैयार की जाती है। इन महिलाओं का कहना है कि इस तरह सदियों से कला को जारी रखते हुए उसे आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कला की मौजूदगी की रक्षा की है। इस कारीगरी से कई महिलाओं ने अपनी बेटी की शादी कर दी। यह महिलाएं हर तरह के कपड़े जैसे कि चिकनकारी, शिफॅान,रेडी टू वेयर ड्रेस के साथ कई अनगिनत फैशन के बीच अपनी कला को कायम रखने में सफल हो पाई हैं।