मलकानगिरी में आदिवासी महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह, कालाजीरा और कलाबती जैसी दुर्लभ और खुशबूदार पारंपरिक धान की किस्मों की जैविक खेती करके स्थानीय आजीविका को बदल रहे हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
ओडिशा की आदिवासी महिलाएं कमाल कर रही हैं। उनके लिए वहां का धान सिर्फ धान नहीं है, बल्कि सोना साबित हो रही है, क्योंकि दुर्लभ धान की जैविक खेती करके महिलाएं बहुत कमा रही हैं। जी हां, यह कमाल कर दिखाया है मलकानगिरी में आदिवासी महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह ने। उन्होंने कालाजीरा और कलाबती जैसी दुर्लभ धान को नयी पहचान दे दी है। शानदार कमाई के साथ विदेशों में भी पहचान बन रही है। बता दें कि इसकी पहल सदस्यों को हर महीने ₹3,000 से ₹5,000 कमाने में मदद करती है और साथ ही जलवायु के अनुकूल स्थानीय फसलों को फिर से बढ़ावा देती है। यहां की स्थानीय न सिर्फ महिलाएं जैविक खेती करती हैं, बल्कि वे कटाई, मिलिंग और पैकेजिंग सहित पूरी प्रक्रिया को खुद संभालती हैं। बता दें कि 'मिशन शक्ति' और 'ORMAS' जैसे सरकारी कार्यक्रमों के सहयोग से, इन समूहों को आधुनिक इलेक्ट्रिक मिलिंग यूनिट, बीज और प्रशासनिक सुविधाएं मिलती हैं। वहीं प्रोसेस्ड कालाजीरा चावल स्थानीय सरकारी मेलों और बाज़ारों में लगभग ₹100 प्रति किलो के भाव से बेचा जाता है। गौरतलब है कि चावल का राजकुमार" (Prince of Rice) कहे जाने वाले कालाजीरा के दाने जीरे जैसे दिखते हैं और इनका स्वाद नट्स जैसा और खुशबू बहुत हल्की और अच्छी होती है। उल्लेखनीय है कि आसानी से पचने वाला और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला यह चावल डायबिटीज के मरीज़ों के खान-पान और सेहत से जुड़ी पारंपरिक ज़रूरतों के लिए बहुत अच्छा है। इनकी सफलता की कहानी इसलिए भी सुनी जानी चाहिए, क्योंकि कालिमेला ब्लॉक के टेलेराई जैसे दूर-दराज इलाके, जो कभी गैर-कानूनी गांजे की खेती के दाग से जूझ रहे थे, अब सफलतापूर्वक टिकाऊ खेती के केंद्र बन गए हैं। वाकई में,उनकी मेहनत और विजन को सलाम है, जिन्होंने आत्मनिर्भरता के साथ अपनी जगह पर लगे काले धब्बे और कलंक को भी मिटाने का काम किया है।
*Image used is only for representational purpose.