ग्रामीण बंगाल का एक खास होमस्टे है, जो कला के माध्यम से 2500 आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर जीवन बनाने में मदद कर रहा है। आइए जानते हैं विस्तार से।
अगर हम आपसे यह कहें कि पश्चिम बंगाल में एक ऐसा होम स्टे है, जहां कला को बढ़ावा देकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है, तो आप इसके बारे में क्या कहेंगे। जी हां, अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं और कभी पश्चिम बंगाल के ग्रामीण बंगाल के शांतिनिकेतन क्षेत्र में जाएं, तो मोरम जरूर घूमें और ठहरें, क्योंकि मोरम, जिसका स्थानीय बोली में अर्थ लाल मिट्टी है और यह एक प्रमुख सामाजिक उद्यम है, जो कि इको-टूरिज्म को बढ़ावा दे रहा है और शिल्प समूह है। गौरतलब है कि यह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में, शांतिनिकेतन के पास देबानंदपुर गांव में स्थित है। अगर हम इसके प्रोजेक्ट की शुरुआत की बात करें, तो इस प्रोजेक्ट की शुरुआत बीरभूम की खास लाल मिट्टी के एक पूरी तरह से फटे हुए, सूखे टुकड़े को सफलतापूर्वक फिर से ज़िंदा करके एक हरे-भरे जंगल वाले इकोसिस्टम में बदलने से हुई। यह जगह अब 5,600 से ज्यादा पेड़ों का घर है। उल्लेखनीय है कि मोरम के आस-पास के गांवों की 2,500 से ज्यादा स्थानीय और आदिवासी महिलाओं के साथ सक्रिय रूप से मिलकर काम करता है और उन्हें ट्रेनिंग देता है। यह उन्हें स्वतंत्र शिल्प उद्यमी बनने में मदद करता है, जिससे वे लंबे समय से चली आ रही आर्थिक उपेक्षा से बाहर निकल पाती हैं। वहीं मुख्य जगह के ठीक बगल में, मोरम ने कारीगरों के लिए खास काम करने की जगहें बनाई हैं। साथ ही स्थानीय महिलाएं पारंपरिक और टिकाऊ चीजें बनाती हैं, उन्हें डिजाइन करती हैं और सीधे बेचती हैं। इन चीजों में बाटिक कपड़े, कांथा कढ़ाई, ऑर्गेनिक मिट्टी के बर्तन और हाथ से बनी बांस की उपयोगी चीजें शामिल हैं। वहीं यात्री गांव के कारीगरों के साथ मिलकर खुद चीजें बनाने के सेशन में हिस्सा ले सकते हैं, और ब्लॉक प्रिंटिंग, बुनाई या मिट्टी के बर्तन बनाने की कला सीधे उन्हीं से सीख सकती हैं, वाकई इस जगह ने महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया है।
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