बिहार की पत्रकार सुरभि कुमारी ने बिहार में ‘पीरियडशाला’ सत्र और सैनिटरी पैड यूनिट की शुरुआत की है; उन्होंने हजारों महिलाओं और लड़कियों को किफायती उत्पाद और अपने शरीर के बारे में जानकारी (बॉडी लिटरेसी) हासिल करने में मदद की है। आइए जानते हैं विस्तार में।
सुरभि कुमारी उन महिलाओं में से एक हैं, जो पत्रकार होने के नाते सिर्फ लिखना नहीं जानतीं, बल्कि परेशानियों को सुलझाने में भी यकीन रखती हैं। जी हां, पीरियडशाला के जरिए, सुरभि बिहार के गया जैसे जिलों के गांवों के आंगन और सरकारी स्कूलों में, व्यवस्थित और खुले संवाद वाले एजुकेशनल सेशन आयोजित करती हैं। इन वर्कशॉप्स में छोटी बच्चियों, महिलाओं और यहां तक कि स्थानीय लड़कों को भी बायोलॉजिकल तथ्यों के बारे में जानकारी दी जाती है, जिससे पीढ़ियों से चली आ रही चुप्पी और टैबू को तोड़ा जा सके। सस्ते पैड्स की कमी को दूर करने के लिए, सुरभि ने बरगांव गांव में पूरी तरह से ऑटोमेटेड सैनिटरी पैड बनाने की एक यूनिट शुरू की। इस यूनिट में ‘सबला’ ब्रांड के तहत उच्च गुणवत्ता वाले सैनिटरी नैपकिन बनाए जाते हैं, जिससे उत्तरी भारत के ग्रामीण इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर की एक बड़ी कमी पूरी होती है। साथ ही साथ ग्रामीण पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखते हुए, उनकी यूनिट में बनने वाले सैनिटरी पैड्स 85% तक बायोडिग्रेडेबल होते हैं, जो बाजार में मिलने वाले ज्यादा प्लास्टिक वाले विकल्पों के मुकाबले थोड़ा अधिक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं। पीरियडशाला के जरिए सुरभि के जमीनी स्तर पर किए गए काम से बिहार भर में 25,000 से ज्यादा महिलाओं और छोटी बच्चियों तक मदद पहुंची है, जिससे स्थानीय समुदायों का मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य को देखने, उस पर बात करने और उसे संभालने का नजरिया पूरी तरह बदल गया है। गौरतलब है कि अब इसे बनाने और बांटने की पूरी सप्लाई चेन समुदाय द्वारा ही चलाई जाती है और इसमें स्थानीय ग्रामीण महिलाओं को उत्पादन और बिक्री का काम संभालने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है और उन्हें रोजगार भी मिलता है, जिससे उन्हें आर्थिक आजादी भी मिलती है। वाकई, गांव की बच्चियों के लिए यह शानदार काम हो रहा है।
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