पुराने दिनों में बच्चों को खिलौने के तौर पर लकड़ी के बनाए हुए सामान दिए जाते हैं। लकड़ी के हाथी और बर्तनों के अलावा कई सारी चीजें अधिक इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। लेकिन बीते काफी समय से लकड़ी के खिलौने अपने स्थान को खो रहे थे। लेकिन कई लोगों ने इसे पहचान दिलाने का कार्य किया है और देश के साथ विदेश में लकड़ी के सामानों की अधिक मांग बढ़ गई है। खासतौर पर काशी की पारंपरिक लकड़ी को पहचान दिलाने का काम शुभी अग्रवाल कर रही हैं।
ज्ञात हो कि काशी के बाजारों तक सीमित रहने वाले बनारस के खिलौनों को विदेश के कई शहरों में पहुंचाया जा रहा है। जापान, फ्रांस, स्पेन, ब्राजील के साथ इंग्लैड तक पहुंचाने का काम शुभी अग्रवाल बखूबी कर रही हैं। दिलचस्प है कि सबसे पहले शुभी ने इस पर काफी रिसर्च किया और फिर इस काम में अपने रूचि को आगे बढ़ाते हुए बड़े स्तर पर लकड़ी के खिलौने को तैयार करना शुरू किया है। साल 2017- 2018 के बाद बाजार के हालात को समझने का प्रयास किया। खासतौर पर पौराणिक कथाओं पर आधारित खिलौनों को प्राथमिकता दी। रामायण, भगवान शिव और हनुमान पर आधारित खिलौने तार किए।
हालांकि शुभी के लिए लकड़ी के खिलौनों का काम नया नहीं है, बल्कि सालों से उनका परिवार लकड़ी के खिलौने का बिजनेस कर रहा है। उनका परिवार 1958 से इस बिजनेस को कर रहा है। शुभी के दादाजी ने इस काम की शुरुआत की और परिवार के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी उनका यह बिजनेस बढ़ता चला गया। दादाजी के समय के दौरान बच्चों का झुनझुना, सिंदोरा, फिरंगी के साथ अन्य पारंपरिक लकड़ी के उत्पाद बनाए जाते रहे हैं। इसके बाद विदेशी पर्यटकों के बीच इसकी बढ़ती हुई मांग को देखते हुए नए तरह के प्रयोग किए गए और विदेशी पर्यटकों की रूचि के अनुसार लकड़ी के प्रोडक्ट बनाने का कार्य किया जा रहा है और इस काम को सतत जारी रखा जा रहा है।