महिलाएं अगर ठान लेती हैं, तो हर कमाल कर दिखाती हैं। कुछ ऐसा ही कमाल छत्तीसगढ़ की नीरजा कुद्रिमोती ने किया है, जिन्होंने 30 हजार महिला-प्रधान परिवारों के साथ मिलकर क्लाइमेट रेजिलिएंस यानी कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने की क्षमता पर काम करने की ठानी और फिर 7 राज्यों अद्भुत काम कर दिखाया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
छत्तीसगढ़ की ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने कभी अपनी परिस्थिति को लेकर शिकायत नहीं की है, बल्कि उपाय ढूंढने के काम किए हैं। कुछ ऐसे ही उपाय तलाश की है, छत्तीसगढ़ की नीरजा कुद्रिमोती ने, जिन्होंने ऐसा काम कर दिखाया है कि सभी अचरज में हैं। उन्होंने वह काम अपनी दुनिया के लिए किया है और अपने गांव के लिए किया है, जो काम कई साइंटिस्ट या वैज्ञानिक भी नहीं कर पाते।गौरतलब है कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर सिर्फ खुद काम नहीं किया है, बल्कि अपनी तरह अन्य महिलाओं को भी इससे अवगत कराया है और यही नहीं उन्होंने 30 हजार महिला-प्रधान परिवारों के साथ मिलकर क्लाइमेट रेजिलिएंस यानी कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने की क्षमता पर भी काम किया है।
आपको नीरजा के बारे में दिलचस्प बात यह बता दें कि नीरजा का नाम नीरजा भनोट के नाम पर रखा गया था, जो पैन एम की फ्लाइट अटेंडेंट थीं, जिन्होंने 1986 में कराची विमान अपहरण के दौरान यात्रियों की जान बचाई और ऐसा करते हुए अपनी जान गंवा दी। उन्हें उनकी असाधारण बहादुरी और अटूट साहस के लिए याद किया जाता है। उनके परिवार के बारे में बात करें, तो उनकी मां एक रेडियोलॉजिस्ट, अपने समय से आगे की नारीवादी और कन्या भ्रूण हत्या की प्रबल विरोधी थीं। नीरजा बचपन से ही प्रकृति के बीच में पली बढ़ी हैं और यही वजह रही कि वह सांपों, केकड़ों और जल निकायों से डरती नहीं थी। तो जब नीरजा की मां का देहांत हुआ, तो उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया, उन्होंने मां की शिक्षा और परवरिश को कमजोर नहीं ठहराया। और उन्होंने अपनी शिक्षा का इस्तेमाल सही तरीके से किया और यह क्षेत्र चुना। आपको इस बारे में भी जानकारी होनी चाहिए कि उन्होंने 'ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया' (TRI) में क्लाइमेट एक्शन के लिए एसोसिएट डायरेक्टर के तौर पर काम करना शुरू किया है। उल्लेखनीय बात यह है कि इन्होंने अपने करियर के 15 साल से ज्यादा समय क्लाइमेट रेजिस्लेस बनाने में और जेंडर इक्विटी (लैंगिक समानता) सुनिश्चित करने और ग्रामीण आजीविका को बेहतर बनाने में लगाए हैंआपकी जानकारी के लिए बता दें कि इनका काम मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और ग्रामीण भारत के अन्य बारिश पर निर्भर इलाकों में सरकारी प्रशासन और आदिवासी समुदायों के बीच की दूरी को कम करता है। और यही नहीं इनका काम छत्तीसगढ़ में मिलेट्स मिशन शुरू करने में राज्य सरकार की मदद करके आदिवासी खेती के तरीकों को फिर से जीवित करने में अहम भूमिका निभाने में भी रही है। इन्होंने राज्य के पहले 'मिलेट्स कैफे' को शुरू करने में भी सफलता दिलाई है। इनका एक महत्वपूर्ण योगदान यह भी रहा है कि इन्होंने इको-रिस्टोरेशन यानी कि पर्यावरण के लिए खास प्रोजेक्ट्स किये हैं और साथ ही साथ 30 हजार से ज्यादा ग्रामीण और महिला-प्रधान परिवारों के साथ काम किया है। साथ ही साथ यह भी बता दें कि पिधापाल जैसे गांवों में, इनकी कम्युनिटी-ड्रिवन प्लानिंग समुदाय-आधारित योजना ने हर साल 609,000 क्यूबिक मीटर पानी बचाने और साथ ही स्थानीय रोजगार पैदा करने में मदद की।
वाकई में, हमें ऐसी मिसाल की बेहद जरूरत है, जो महिलाओं की बेहतरी के लिए काम करें, साथ ही नीरज जैसी शिक्षित महिलाएं इस तरह प्रेरणादायक काम करें तो ग्रामीण क्षेत्र भी बहुत बेहतर हो सकता है।
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