कतरन से भी क्रिएटिविटी की जा सकती है, यह साबित किया है मध्य प्रदेश की अनुश्री और रंजना गुप्ता ने। आइए जानते हैं विस्तार से।
सोच कुछ अलग करने की

क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर जो दर्जियों के पास आप कपड़े सिलवाने जाती हैं, लेकिन फिर जो उसके कतरन बचते हैं, उनका क्या होता होगा। क्या आपको पता है कि कचरा सिर्फ किचन से नहीं कपड़ों से भी निकलता है और वह प्लास्टिक जितना ही खतरनाक होता है? अगर आपने कभी इस तरह से नहीं सोचा है, तो अब सोचना शुरू कीजिए, क्योंकि मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर की इन मां-बेटी की जोड़ी ने यह कमाल कर दिखाया है, जिन्होंने कचरे में क्रिएटिविटी से RAAS India की शुरुआत की है। हम बात कर रहे हैं अनुश्री गुप्ता और को-फाउंडर रंजना गुप्ता की, जिन्होंने बताया अपना पूरा तरीका। अनुश्री बताती हैं कि उन्होंने और उनकी मां ने RAAS India की शुरुआत पिछले साल की है और उन्हें एक साल में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। अनुश्री बताती हैं कि वह खुद NIFT से ग्रेजुएट हैं, और वह इस बात को समझती हैं कि कितना अधिक टेक्सटाइल वेस्ट निकलता है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए उन्होंने इसे क्रिएटविटी में बदलने के बारे में सोचा।
नाम रखने की खास वजह
अनुश्री और रंजना बताती हैं कि उनके दिमाग में हमेशा से यह बात थी कि क्योंकि कतरन से कुछ बनाना, उन्होंने बचपन से मां को देखा था, तो उन्हें पता था कि मां वाली फीलिंग, नॉस्टेलजिक फीलिंग, अपनापन वाली फीलिंग, जिससे कि लोग जुड़ाव महसूस करें और एक कनेक्शन महसूस करें, यह कोशिश थी और इसलिए उन्होंने भारतीयता का भी एहसास हो, ऐसे शब्द को खोजा, जो पौराणिक भारत से भी जुड़ाव महसूस कराये और इस तरह से RAAS India अस्तित्व में आया, जो पारम्परिक और आधुनिकता का समावेश है और लोग इससे कनेक्ट कर पाएं। अनुश्री बताती हैं कि मां को उन्होंने हमेशा घर में रखी चीजों से कुछ नया बनाते देखा है, कभी भी कुछ बर्बाद करते नहीं देखा, इसलिए उनके लिए इस तरफ सोच पाना अधिक कठिन नहीं था, वह अब पूरी दुनिया को कतरन के इस्तेमाल समझाने और दर्शाने की कोशिश कर रही हैं। गिफ्टिंग के लिए खासतौर से यह प्रोडक्ट्स काफी कमाल और खास लगते हैं।
बचाना है पर्यावरण को

रंजना और अनुश्री बताती हैं कि हजारों टन कचरा बर्बाद हो रहा है और इससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। पोलिस्टर जो कपड़े के वेस्ट से निकलते हैं, काफी बर्बाद करते हैं पर्यावरण को और इसकी वजह से काफी दिक्कतें आ रही हैं, सो बेहद जरूरी है कि इसका कोई विकल्प हम अपनी सोच से करें, तो इसलिए हमने इसकी शुरुआत की, इसमें हम बैग्स बनाते हैं और भी कई चीजें बनाते हैं।
आती हैं परेशानियां भी
अनुश्री कहती हैं कि दर्जी से जब हम कतरन या टेक्सटाइल वेस्ट लेने जाते हैं, वह सारा कचरा दे देता है और फिर हमें उसे हटाने में काफी वक़्त लगता है, साथ ही यह हानिकारक भी होता है। सच कहूं तो इसके अलावा, ग्वालियर जैसी जगह में लोग हमारे काम को समझने में वक़्त लगाते हैं, हम जैसी चीज बना रहे हैं, अभी उसका वैसा क्रेज नहीं है, बड़े शहरों में अधिक है, तो लोगों को समझाना कठिन रहा है, इसके अलावा, सोशल मीडिया से एक अच्छा सपोर्ट मिला है, लोग हमारा काम देख कर समझ पा रहे हैं कि हम कोई स्कैम नहीं कर रहे हैं, मेहनत से चीजें बना रहे हैं, तो लोग हमारी चीजों को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। एक बात हम लोगों को समझाना चाहते हैं कि यह काफी मेहनत का काम है और धैर्य का, तो लोग इस बात को समझते हुए हमारे काम का आंकलन करें। खासतौर से सेग्रिगेशन का काम काफी कठिन रहता है।
सस्टनेबिलिटी है भविष्य

रंजना और अनुश्री मानती हैं कि सस्टनेबिलिटी ही भविष्य है, हमें इसको समझना होगा, क्योंकि हमें अपने पर्यावरण को तो बचाना ही है, साथ ही हमें अपने आने वाली पीढ़ियों को भी समझाना है कि क्यों यह जरूरी है। अनुश्री कहती हैं कि धीरे-धीरे ही सही, वह आने वाले वर्षों में यही चाहती हैं की अपसाइक्लिंग में, रीसायक्लिंग में और साथ ही चीजों को बार-बार इस्तेमाल करने की सोच को आगे बढ़ाने में सक्रिय रहने की कोशिश करेंगी और भारत की अपनी जो एक परंपरा रही है कि जो है, उसका सही इस्तेमाल करना, वह बरक़रार रखना चाहेंगी और आगे बढ़ना चाहेंगी।
*All pictures credit : @anushree gupta