राजस्थान के असनावर गांव में सुशीला देवी अख़बारों से बैग खुद भी बना रही हैं और अन्य महिलाओं को भी इसमें शामिल कर चुकी हैं। आइए जानते हैं विस्तार से। राजस्थान के असनावर गांव में इन दिनों आपको हर कोई खूबसूरत बैग लिए नजर आएंगे, हो सकता है कि आपके हाथों में भी जो लैपटॉप हो और लोगों ने आपकी कभी तारीफ़ की हो कि अरे बैग तो बहुत अच्छा है है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे किसने बनाया होगा। कुछ ऐसा अगली बार हो कि आपके हाथों में अख़बारों से बना लैप टॉप पहुंचे, तो आपको समझ लेना होगा कि यह ऐसे ही बैग नहीं है, बल्कि किसी ने बहुत मेहनत से इसे बनाया है। जी हां, राजस्थान के असनावर गांव की रहने वाली सुशीला देवी ने उसी गांव में रहते हुए लैपटॉप बैग बनाना शुरू किया और वह भी अख़बारों के कतरन से। वह खुद भी इसे बना रही हैं और गांव की अन्य महिलाओं को भी इसे बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
बता दें कि सुशीला देवी एक मज़बूत इरादों वाली ग्रामीण उद्यमी हैं। उन्होंने अपने जीवन के गहरे निजी दुख को एक सफल "वेस्ट-टू-वेल्थ" (कचरे से कमाई) वाले इको-फ्रेंडली बिज़नेस में बदल दिया। गौरतलब है कि पति की दुखद मृत्यु के बाद, उनके लिए कठिनाइयां आयीं, क्योंकि उनके पांच बच्चे थे और उनकी कोई बचत नहीं बची थी, तो गुज़ारा करने के लिए उन्होंने हथकरघा बुनाई, सिलाई और ब्लॉक प्रिंटिंग का काम सीखा। फिर उन्होंने दिमाग लगाया और कच्चे माल में अधिक लागत नहीं लगाते हुए, उन्होंने बेकार अख़बारों से मज़बूत और बहुत स्टाइलिश लैपटॉप बैग, टोट बैग और एक्सेसरीज़ बनाने की एक नई तकनीक विकसित की। और नतीजा यह हुआ कि आज उनका बिजनेस हर महीने ₹5 से ₹6 लाख के ऑर्डर हासिल करता है। बता दें कि सुशीला पुराने अख़बारों को पतली पट्टियों में काटती हैं, उन्हें धागे के साथ मिलाती हैं और पारंपरिक हथकरघा का इस्तेमाल करके एक साथ बुनती हैं। उनके कलेक्शन में मज़बूत लैपटॉप बैग, हैंडबैग, ज्वेलरी पाउच और पारंपरिक शगुन लिफाफे भी शामिल हैं। साथ ही उनके सामान की कीमत ₹50 से ₹2,500 के बीच होती है। बता दें कि 'अमृता हाट' जैसे सांस्कृतिक मेलों में उनकी रोज़ाना की बिक्री ₹10,000 से ₹20,000 तक होती है। उनके अनोखे और पर्यावरण के अनुकूल हाथ से बने सामान को अमेरिका में बहुत पसंद किया जाता है, जिससे उन्हें साल भर एक्सपोर्ट के ऑर्डर मिलते रहते हैं।
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