उत्तर भारत की महिलाओं ने ऐसे कई रास्ते खुद से इख्तियार कर कई सारे उपाय निकाले हैं। कुछ ऐसा ही वाराणसी की सिंधु सिंह ने भी किया है, जिन्होंने स्थानीय किसानों को लगभग 88 टन कतरनी धान सीधे मिलों को बेचने के लिए सफलतापूर्वक मना लिया। आइए जानें विस्तार से।
वाराणसी की सिंधु सिंह की कहानी जमीनी स्तर पर कृषि-उद्यमिता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। उन्होंने स्थानीय किसानों को बिचौलियों(ब्रोकर) को दरकिनार करने के लिए सफलतापूर्वक प्रेरित और संगठित किया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 88 टन कतरनी धान की सीधी बिक्री चावल मिलों को हुई। जी हां, उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से सारा काम किया और किसानों को सीधे मिलों को अपनी उपज बेचने के लिए मना लिया। सिंधु सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें अपनी उपज के लिए पारंपरिक मंडी (बाजार) की बिक्री की तुलना में बेहतर दाम मिलें, जहां बिचौलिए अक्सर एक बड़ा हिस्सा अपने पास रख लेते हैं। आपको बता दें कि कतरनी एक बेहतरीन चावल है और यह एक बहुत ही महंगी और खुशबू से भरपूर चावल की किस्म है, जो इसी क्षेत्र खास तौर पर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों की मूल निवासी है। यह अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए जानी जाती है, जिससे यह सीधे मिलों के लिए एक ऊंचे मूल्य वाली फसल बन जाती है। अगर प्रभाव के पैमाने की बात करें, तो किसी समुदाय को 88 टन (88,000 किलोग्राम) उपज इकट्ठा करने के लिए मनाना, वाराणसी के स्थानीय किसान समुदाय में लॉजिस्टिक्स और आपसी विश्वास बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा प्रयास है। बता दें कि आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भी यह एक खास वरदान साबित हुआ है और उल्लेखनीय है कि इस तरह के सीधे बिक्री मॉडल आमतौर पर किसानों के मुनाफे को 15–20 तक बढ़ा देते हैं, क्योंकि इससे परिवहन लागत और कमीशन कम हो जाते हैं, और साथ ही बड़े पैमाने के मिल मालिकों के साथ बेहतर मोलभाव करने का मौका भी मिलता है।
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