रेशमा दत्ता ने अपने आधार एनजीओ के माध्यम से कई ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
झारखंड के बुंडू जिले में महिलाएं फक्र से कहती हैं कि मैं आत्मनिर्भर हूं, क्योंकि वे आधार के माध्यम से टेराकोटा, डोकरा और मिट्टी के बर्तन बना कर आय कमा रही हैं और इस काम में उन्हें साथ मिला है आर्टिस्ट रेशमा दत्ता का। जी हां, शिल्प या किसी भी कला का यह भी बुंडू जिले में रहने वाली रेशमा 'आधार' नाम का एक NGO चलाती हैं, जो पिछड़े ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को टेराकोटा, डोकरा और मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे पारंपरिक शिल्पों में प्रशिक्षित करता है, जिससे उनके लिए आजीविका के स्थायी और वैकल्पिक साधन तैयार होते हैं। विश्व-भारती, शांतिनिकेतन में पढ़ाई करने और जापान में स्कॉलरशिप मिलने के बाद, वह अपने पुश्तैनी गांव लौट आयीं, ताकि वहां की स्थानीय महिलाओं को टेराकोटा, डोकरा (धातु के बर्तन) और सिरेमिक बनाने की ट्रेनिंग दे सकें। वहीं उनका संगठन खास तौर पर आदिवासी और पिछड़ी जाति की महिलाओं को रोजगार देता है। इनमें से कई महिलाएं ऐसी हैं, जो अपने इलाके में हुई हिंसा का शिकार हुई हैं या जिन्हें उनके परिवार वालों ने छोड़ दिया है। उनकी टीम हर महीने लगभग 2,50,000 चीज़ें बनाती है, जिनमें 62 तरह के कॉर्पोरेट गिफ्ट भी शामिल हैं। इन चीजों की सप्लाई 'झारक्राफ्ट' जैसे सरकारी आउटलेट्स को की जाती है। वहीं पारंपरिक शिल्पकलाओं के अलावा, उन्होंने अपने ट्रेनिंग प्रोग्राम का दायरा बढ़ाया है और अब इसमें लाख की चूड़ियां, हाथ से बने साबुन और समुद्री खेती (mariculture) को भी शामिल किया है, ताकि गांव के परिवारों के लिए कमाई के कई रास्ते खुल सकें। महिलाएं काफी हद तक खुद को आत्मनिर्भर बनाने में कामयाब हो पायी हैं।
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