मिलिए किसान चाची राजकुमारी देवी से, जो बनीं नारी सशक्तिकरण का प्रतीक
मिलिए राजकुमारी देवी से , जिन्हें लोकप्रिय रूप से किसान चाची और साइकिल चाची कहा जाता है। उन्होंने लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बंधनों को तोड़कर नारी सशक्तिकरण का प्रतीक बन गयीं। आइए जानते हैं विस्तार से।
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में रहती हैं और उन्होंने एक खुद के लिए एक खास पहचान बनाई हैं। राजकुमारी देवी के बारे में आपको यह जानकारी बता दें कि राजकुमारी देवी ने पारंपरिक खेती को अहमियत दिया है। उन्होंने अपने क्षेत्र में पारंपरिक खेती में आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने सब्जियों, फलों और जैविक खेती को बढ़ावा देकर एक एकड़ बंजर भूमि को उपजाऊ खेत में बदल दिया। उन्होंने आनंदपुर ज्योति केंद्र की स्थापना की, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है और स्थानीय महिलाओं को रोजगार देकर 23 से अधिक प्रकार के घर में बने अचार, जैम और जेली का उत्पादन करवाती है। ये उत्पाद अब मुंबई और दिल्ली जैसे प्रमुख भारतीय महानगरों में बिकते हैं। उन्हें अक्सर साइकिल चाची भी कहा जाता है। वह धूल भरी ग्रामीण गलियों में साइकिल चलाकर अन्य किसानों को रसोई में खेती करने और मिट्टी की गुणवत्ता के बारे में सुझाव देने के लिए प्रसिद्ध हैं। कृषि और सामाजिक कार्यों में उनके नि: स्वार्थ योगदान के लिए उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया है। उल्लेखनीय है कि उन्हें साल 2019 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वर्ष जनवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, 73 वर्ष की आयु में भी वह सक्रिय हैं और उन्होंने करोड़ों का अचार व्यवसाय खड़ा कर लिया है। वह वर्तमान में भी जैविक खेती को बढ़ावा दे रही हैं।
यह बात बता दें कि राजकुमारी देवी को 26 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस परेड में 'विशेष अतिथि' के रूप में आमंत्रित किया गया था। उन्हें सरकार की 'लखपति दीदी' योजना के तहत आत्मनिर्भर बनने और ग्रामीण महिलाओं को प्रेरित करने के लिए यह सम्मान दिया गया। बता दें कि किसान चाची का जन्म वर्ष 1953 में मुजफ्फरपुर जिले के बरूराज थाना क्षेत्र के मानिकपुर गांव में हुआ। उनके पिता रामचंद्र प्रसाद सिंह एक सरकारी शिक्षक थे, जबकि माता अहिल्या देवी गृहिणी थीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के बरूराज उच्च विद्यालय से प्राप्त की और 10वीं तक पढ़ाई की। साल 1974 में उनका विवाह सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव निवासी अवधेश कुमार चौधरी से हुआ।
बता दें कि वर्ष 1990 में ससुराल में पारिवारिक विवाद के बाद उन्हें पति के साथ अलग कर दिया गया। शादी के 10 साल बाद तक उनका कोई संतान नहीं हुआ था जिस बात को लेकर लोग तरह तरह की बात भी कहते थे, जैसे ऐसे समय में उन्होंने खेतों में काम करना शुरू किया। समाज के ताने, लोगों की टिप्पणियां और परिवार की बातों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। बता दें कि वर्ष 1996 में बस का किराया देने के पैसे नहीं होने पर उन्होंने साइकिल चलाना सीखा और उसी साइकिल से खेतों में उपजी फसल को बाजार तक पहुंचाने लगीं।
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