उत्तर प्रदेश के बाराबंकी की नवप्रवर्तक और पीएम बाल पुरस्कार प्राप्तकर्ता पूजा पाल कई महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, जिन्होंने किसानों के लिए श्वसन स्वास्थ्य संबंधी खतरों को कम करने के लिए धूल रहित गेहूं थ्रेशर अटैचमेंट (भूसा-धूल पृथक्करन यंत्र) विकसित किया है। आइए विस्तार से जानते हैं।
दरअसल, पूजा पाल उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के अघेरा गांव की रहने वाली 17 साल की विद्यार्थी हैं और युवा इनोवेटर हैं, जिन्हें अपने शानदार एग्रीकल्चरल आविष्कार के लिए राष्ट्रीय पहचान मिली है। अगर बात करें, तो वर्ष 2025 दिसंबर में उन्हें साइंस और इनोवेशन में उनके योगदान के लिए प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार के लिए चुना गया। दरअसल, उन्होंने एक कम लागत वाला "भूसा-धूल पृथक्करण यंत्र" (भूसा और धूल अलग करने वाला डिवाइस) बनाया है, जो गेहूं की कटाई के दौरान हानिकारक खेती की धूल को फिल्टर करता है। यह डिवाइस स्क्रैप मेटल, टिन की चादरों और एक पंखे का इस्तेमाल करता है और धूल को पानी के चैंबर में फंसा लेता है ताकि वह हवा में न फैले। यह आविष्कार पारंपरिक कटाई के दौरान बारीक धूल सांस में लेने से किसानों और ग्रामीण समुदायों के बच्चों को होने वाली सांस की बीमारियों और आंखों में जलन जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करता है। साथ ही बता दें कि 2025 में, वह उत्तर प्रदेश की एकमात्र छात्रा थी, जिसे जापान में सकुरा साइंस हाई स्कूल प्रोग्राम में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया था, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने इनोवेशन को दिखाया। खास बात यह है कि उन्हें बाल वैज्ञानिक के नाम से भी जाना जाता है। पूजा ने एक कम लागत वाला, धूल-रहित गेहूं थ्रेशर अटैचमेंट बनाया, जिसका आधिकारिक नाम भूसा-धूल पृथक्करण यंत्र (भूसा और धूल अलग करने वाला उपकरण) है। यह थ्रेशिंग प्रक्रिया के दौरान हवा में मौजूद हानिकारक धूल और भूसे के कणों को फंसाने के लिए एक वॉटर चैंबर और एक सेंट्रीफ्यूगल फिल्ट्रेशन सिस्टम का उपयोग करता है। यह उपकरण पारंपरिक थ्रेशिंग के कारण किसानों और ग्रामीण समुदायों में होने वाली सांस संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं और आंखों में जलन को काफी कम करता है। उन्होंने स्क्रैप धातु और टिन शीट जैसी पुरानी चीजों का उपयोग करके लगभग 3,000 में प्रोटोटाइप बनाया।
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