सुजनी कढ़ाई बार की लोकप्रिय कला है, आइए जानते हैं कि कैसे निर्मला देवी ने इस कला को जीवंत रखने के लिए पूर्ण प्रयास किया है।
क्या है सुजनी कढ़ाई
सबसे पहले तो हम आपको यही बताना चाहेंगे कि सुजनी कढ़ाई क्यों काफी लोकप्रिय हुई। दरअसल, सुजनी बिहार की एक पारंपरिक और प्रसिद्ध हस्तकला है, जो पुरानी सादरियों/धोतियों को मिलाती है, उन पर माहिन रनिंग स्टिच (रनिंग स्टिच) से कहानीनुमा चित्र बनती है। और वर्ष 2007 में जीआई टैग प्राप्त यह कला मूर्तियां (भुसुरा) में उभरी, जो अब ग्रामीण जीवन और प्रकृति के दृश्यों को दर्शाती है।
निर्मला देवी का योगदान
अगर निर्मला देवी के योगदान के बारे में बात करें, तो उन्होंने इस कला को सहेजने में हमेशा योगदान दिया। और उनके योगदान को ही मद्देनजर रखते हुए उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा गया है। दरअसल, वर्ष 2025 में उन्हें इस पारंपरिक कला रूप के संरक्षण और वैश्विक प्रचार में उनके ‘असाधारण योगदान’ के लिए भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अगर ऐतिहासिक रूप से देखें तो सुजनी एक लोक परंपरा थी, जिसमें महिलाएं नवजात शिशुओं के लिए पुराने कपड़ों से रजाई सिलती थीं। वहीं 20वीं शताब्दी के अंत तक, यह शिल्प लगभग विलुप्त हो गया था। लेकिन निर्मला देवी ने वर्ष 1988 में ग्रामीण महिलाओं के लिए इसे एक पेशेवर शिल्प के रूप में पुनर्जीवित करने के लिए एक आंदोलन शुरू किया।
महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
निर्मला देवी ने न सिर्फ इसे जीवंत रखा, बल्कि कई महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया और भविष्य में आगे बढ़ी। नतीजन यह हुआ कि भुसरा के आसपास के 15 से 22 गांवों की 1,000 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित किया है, जिससे उन्हें आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला और उनके काम को बिहार संग्रहालय और लंदन में अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों सहित कई प्रतिष्ठित स्थानों पर प्रदर्शित किया गया है। उनके प्रयासों से सुजनी कढ़ाई को जीआई टैग प्राप्त हुआ, जो इस शिल्प की प्रामाणिकता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करता है। वाकई, निर्मला देवी का योगदान महत्वपूर्ण है और हमेशा ही उनके महत्ता दी जाएगी।
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