मालती घरेलू हिंसा की शिकार रहीं, लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानीं, उन्होंने खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए और बच्चे को अच्छी परवरिश देने के लिए नयी शुरुआत की, ऑटो रिक्शा चलाना सीखा। आइए जानते हैं विस्तार से।
कहते हैं कि डरने से नौका पार नहीं होती, मेहनत करने वालों की हार नहीं होती। लखनऊ की मालती ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है, उन्होंने कभी भी अपनी परेशानी को अपनी मेहनत पर हावी नहीं होने दिया। घरेलू हिंसा की शिकार होने के बावजूद न सिर्फ वह अपने पैरों पर खड़ी हुईं, बल्कि उन्होंने अपने शहर की अन्य महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़े होने की सीख दी। उन्होंने खुद ऑटो रिक्शा चलाना सीखा और बाकी महिलाओं को भी सिखाया। गौरतलब है कि एक दौर में ही हॉकी की खिलाड़ी रही हैं। लखनऊ की सड़कों पर ऑटो-रिक्शा चलाने वाली पहली महिला ऑटो ड्राइवर हैं। बता दें कि मालती को बचपन से ही खेलों से बहुत प्यार था। उन्होंने छह साल की उम्र में हॉकी खेलना शुरू किया और बाद में राज्य स्तर पर उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में और सुनसान सड़कों पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, मालती आज भी अपने ऑटो में हर समय अपनी हॉकी स्टिक अपने साथ रखती हैं। गौरतलब है कशादी के बाद, मालती को कई सालों तक अपने पति और ससुराल वालों से गंभीर घरेलू हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। लेकिन फिर उन्होंने हिम्मत किया और अपने छोटे बेटे को साथ लिया और हमेशा के लिए वह घर छोड़ दिया। बाद में, उन्होंने लखनऊ में बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय (BBDU) में लड़कियों की हॉकी कोच और खेल शिक्षिका के रूप में भी कुछ समय तक काम किया। फिर आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए, उन्होंने एक NGO से मदद ली, जिसने उन्हें ई-रिक्शा और ऑटो चलाना सिखाया। सरकार और NGO के सहयोग से, उन्हें एक वाहन और ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया। मालती ने लखनऊ में व्यावसायिक तौर पर ऑटो चलाना शुरू कर दिया। उस समय, पुरुषों के वर्चस्व वाले इस पेशे में कदम रखने वाली वह एकमात्र महिला थीं। अच्छी बात यह है कि अब वे अन्य महिलाओं को भी यह काम करने के लिए प्रेरित कर रही हैं, ताकि अच्छा माहौल बन पाए और लड़कियां भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
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