कंचन देवी एक प्रेरणा हैं कि कम संसाधन में भी कैसे एक मुकाम हासिल किया जा सकता है। आइए जानें विस्तार से।
दुनिया में हम महिलाओं के बढ़ने और काफी कुछ कर जाने के बारे में बात करते हैं, लेकिन इन सबके बीच छोटे से ग्रामीण इलाके में भी महिलाएं एक खास पहचान बना रही हैं, इस बात का अनुमान हम नहीं लगा पाते हैं। लेकिन कंचन देवी जैसी महिलाएं प्रेरणा बनती हैं कि किस तरह से छोटी-सी सोच से महिला सशक्तिकरण किया जाए। जी हां, कंचन देवी को बिहार के भागलपुर में कृषि और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके काम, खासकर पहला महिला-प्रबंधित किसान उत्पादक संगठन (FPO) स्थापित करने में उनकी भूमिका के लिए 'अपराजिता सम्मान' से सम्मानित किया जा चुका है और इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वहएक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं, जहां कृषि 134 परिवारों का सहारा है, कंचन ने जमीन का ज्ञान हासिल किया और मौसमों और फसलों के जटिल चक्र को सीखा। और गौरतलब यह है कि एक ऐसे क्षेत्र में, जहां महिला साक्षरता दर सिर्फ 15 प्रतिशत है, कंचन का हौसला कभी कम नहीं हुआ और उन्होंने अपनी साथी महिला किसानों को एकजुट किया और उनमें उम्मीद की भावना जगायीं। प्रशिक्षण सत्रों और साझा अनुभवों के माध्यम से, उन्होंने स्थायी कृषि पद्धतियों और महिलाओं के अधिकारों की वकालत की। साथ ही कंचन ने अपनी फसलों से शुद्ध लाभ में 30 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि देखी और यह नई समृद्धि सिर्फ उनके खेतों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसने उनके घर पर भी असर डाला, जिससे मरम्मत हुई और उनके सपनों को पंख लगे। अब वहां उन्हें ‘फार्मर दीदी’ या ‘किसान दीदी’ के नाम से पुकारा जाने लगा है।
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