कानपुर की कलावती देवी ने कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया। उत्तर प्रदेश के कानपुर की एक जानी-मानी सोशल वर्कर और राजमिस्त्री हैं कलावती देवी, जिन्हें सैनिटेशन के क्षेत्र में उनके बदलाव लाने वाले काम के लिए जाना जाता है। आइए जानें विस्तार से।
एक महिला इस बात को समझ सकती हैं कि अगर एक महिला को किसी ग्रामीण इलाके में शौच जाना पड़े, जहां शौचालय उपलब्ध ही नहीं है। ऐसे में कुछ महिलाएं केवल अफसोस करके रह जाती हैं, लेकिन कुछ कदम बढ़ाती हैं और अनोखा काम कर जाती हैं। जी हां, कानपुर की कलावती देवी ने कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया। उत्तर प्रदेश के कानपुर की एक जानी-मानी सोशल वर्कर और राजमिस्त्री हैं कलावती देवी, जिन्हें सैनिटेशन के क्षेत्र में उनके बदलाव लाने वाले काम के लिए जाना जाता है। उनका जन्म 1965 के आस-पास सीतापुर में हुआ था, वह किशोरावस्था में दुल्हन बनकर कानपुर आयीं और बाद में स्वच्छ भारत अभियान (क्लीन इंडिया मिशन) के पीछे एक अहम ताकत बनीं। इसके बाद उन्होंने देखा कि उनके जैसी कई ऐसी महिलाएं हैं, जो शौचालय न होने की वजह से परेशानियों का सामना कर रही हैं, तो उन्होंने यह स्टेप लिया और कदम बढ़ाया। और फिर उन्होंने ठाना कि वह कुछ न कुछ तो करके रहेंगी। ऐसे में अपने समुदाय और आस-पास के गांवों में 4,000 से ज्यादा टॉयलेट बनवाए गए हैं। उनका मिशन राजा का पुरवा झुग्गी बस्ती से शुरू हुआ, जहां शुरुआत में 700 परिवारों के लिए एक भी टॉयलेट नहीं था। उनके इस कदम की खासियत यह है कि पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं को तोड़ते हुए, सिर्फ आवाज नहीं उठायी, बल्कि उन्होंने खुद सैनिटेशन सुविधाओं के निर्माण और सुपरविजन के लिए एक राजमिस्त्री के तौर पर ट्रेनिंग ली, ताकि वह खुद इसे बना पाएं, उनकी सोच यह रही कि वह किसी के सामने भी हाथ नहीं फैलाना चाहती थीं और न ही किसी पर निर्भर रहना चाहती थीं। ऐसे में उन्होंने खुद ट्रेनिंग भी ली। गौरतलबब है कि उन्होंने सालों तक घर-घर जाकर लोगों को साफ-सफाई की अहमियत समझाने और टॉयलेट बनाने और इंस्टॉल करने के लिए फंडिंग के प्रति विरोध को खत्म करने की कोशिश की। उन्होंने ऐसी जगहों को चुना, जहां खास तौर पर राखी मंडी जैसे गरीबी से जूझ रहे झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों को टारगेट किया गया, जहां खुले में शौच करना एक बड़ा स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से असुरक्षित था। उल्लेखनीय है कि अपने पति और दामाद दोनों को खोने की त्रासदी के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी और पोते-पोतियों को सपोर्ट करने के लिए अपना काम जारी रखा है। उनके प्रयासों से हजारों लोगों, खासकर ग्रामीण कानपुर की महिलाओं और लड़कियों की सेहत, सुरक्षा और गरिमा में काफी सुधार हुआ है। बता दें कि उन्हें वर्ष 2020 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भारत के राष्ट्रपति से महिलाओं के लिए भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला था और साथ ही वह उन सात सफल महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने अपनी प्रेरणादायक कहानियों को शेयर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर अकाउंट संभाला। वाकई इनकी कहानी प्रेरणादायक है
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