यह जानना जरूरी है कि वर्तमान दौर में महिलाओं को बेहद जरूरी है कि सस्टेनेबल तरीका जीने का सोचें। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वालीं डॉ जनक पाल्टा मैकगिलिगन एक जानी-मानी भारतीय समाज सेविका, पर्यावरणविद् और पद्म श्री पुरस्कार विजेता हैं। वे सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास), सोलर कुकिंग और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अपने बेहतरीन कामों के लिए मशहूर हैं। 16 फरवरी 1948 को जन्मीं डॉ. जनक ने भारत भर के ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में बदलाव लाने के लिए कई दशक समर्पित किए हैं। वे ऐसे संस्थान स्थापित करने के लिए सबसे ज़्यादा जानी जाती हैं, जो आदिवासी युवाओं और महिलाओं को पर्यावरण और समाज में बदलाव लाने वाले आत्मनिर्भर व्यक्ति बनने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। वे इंदौर स्थित इस NGO की संस्थापक-निदेशक हैं। यह NGO समुदाय-आधारित पर्यावरणीय विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करता है और इसने 40,000 से ज्यादा छात्रों को सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता) से जुड़ी प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया है। वे 'सोलर कुकर्स इंटरनेशनल' के लिए ग्लोबल एडवाइजर के तौर पर काम करती हैं और 'सोलर फूड प्रोसेसिंग नेटवर्क' के लिए भारत की नेशनल कोऑर्डिनेटर हैं। गौरतलब है कि 16 फरवरी, 1948 को पंजाब के जालंधर में एक पंजाबी परिवार में जन्मीं, वे चंडीगढ़ में पली-बढ़ीं और वहीं अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी की। उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट उस वक़्त आया, जब 15 साल की उम्र में, एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी और ओपन-हार्ट सर्जरी से बचने के बाद, उन्होंने जीवन भर सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए खुद को समर्पित करने का संकल्प लिया। फिर 1985 में, वह इस संस्थान को शुरू करने के लिए एक बहाई पायनियर के तौर पर इंदौर चली गयीं। फिर 26 सालों तक इसकी संस्थापक-निदेशक के रूप में, उन्होंने सामाजिक रूप से पिछड़े 500 गांवों की 6,000 से ज्यादा आदिवासी और ग्रामीण युवतियों को सशक्त बनाने और उन्हें प्रशिक्षित करने में मदद की। इसका पाठ्यक्रम साक्षरता, स्वास्थ्य, आजीविका और सोलर कुकिंग पर केंद्रित है। उल्लेखनीय है कि उनका घर बिना कोई कचरा पैदा किए या यूटिलिटी बिल के पूरी तरह चलता है। खाना पकाने के लिए यह घर सोलर कुकर पर निर्भर है। घर और आस-पास के 50 आदिवासी परिवारों के घरों में रोशनी के लिए उनके दिवंगत पति द्वारा बनाए गए 2 kW के विंड-सोलर हाइब्रिड पावर स्टेशन का इस्तेमाल होता है और यहां 160 पेड़ों और 13 तरह की फसलों से ऑर्गेनिक खाना उगाया जाता है। बता दें कि बारिश के दिनों में वह पुराने और बेकार हो चुके अख़बारों से बनी घर की बनी बायोमास ईंटों का इस्तेमाल करके अपना चूल्हा जलाती हैं, लेकिन सस्टेनेबल जिंदगी ही जीती हैं।
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