झारखंड की रहने वालीं जो छुटनी महतो जादू-टोने की भयावह प्रथा के खिलाफ अपने अथक संघर्ष के लिए जानी जाती हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
महिलाएं जीवन में चाहें, तो क्या नहीं कर सकतीं और एक महिला ही दूसरी महिला का दर्द समझ सकती हैं और खुद छुटनी महतो के साथ कुछ ऐसा ही हुआ और उन्होंने एक जंग लड़ी। उन्होंने डायन प्रथा जैसी कुप्रथा और जादू टोने जैसे अंधविश्वास के खिलाफ खुद को खड़ा किया और इसे खत्म करने की मुहिम शुरू की। गौरतलब है कि वर्ष 1995 में, छुटनी महतो को उनके ही ससुराल और ग्रामीणों द्वारा डायन करार दिया गया था। उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं और गांव से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद, उनकी जिंदगी आसान नहीं रहीं और उन्होंने खुद कई परेशानियां और अन्याय झेला था, लेकिन उन्होंने तय किया कि वह अन्य महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होने देंगी और इसलिए उन्होंने अपने आघात को एक मिशन में बदलते हुए, उन्होंने एनजीओ आशा (एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस) में काम करना शुरू किया और अब वह बीरबंस में एक पुनर्वास केंद्र चलाती हैं, जहां वह पीड़ितों को कानूनी सहायता और आश्रय प्रदान करती हैं। वहीं उनकी बहादुरी और सामाजिक सेवा के लिए, उन्हें वर्ष 2021 में पीआईबी द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में अब तक 125 से अधिक महिलाओं को ऐसी प्रताड़ना से बचाया है। बता दें कि पूर्वी सिंहभूम प्रशासन ने उन्हें ग्रामीण ब्लॉकों में जागरूकता बढ़ाने के लिए अपने जादू-टोने विरोधी अभियान का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया। साथ ही वह कार्यशालाओं और सेमिनारों का नेतृत्व करना जारी रखती हैं, और हाल ही में उनके निरंतर सामाजिक प्रभाव के लिए उन्हें आरएएफ की 106वीं बटालियन द्वारा सम्मानित किया गया है। उनके प्रेरणादायक जीवन पर आधारित एक फिल्म बनाने की तैयारी भी चल रही है, ताकि उनकी कहानी अधिक लोगों तक पहुंच सके।
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