प्रयागराज की एक खास आर्टिस्ट ने मूंज आर्ट को कई पीढ़ियों तक जिंदा रखा है। आइए जानते हैं विस्तार से।
महिलाएं कई पीढ़ियों तक अपने आर्ट को बचाने में या संरक्षण करने में अपनी शिद्दत लगा देती हैं, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की चांद, उन्हीं महान आर्टिस्ट या कलाकारों में से एक हैं, जिन्होंने अपना जीवन मूंज शिल्प को संरक्षित करने के लिए समर्पित कर दिया। मूंज शिल्प कारखानों के माध्यम से नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रयासों से जीवित है। दरअसल, महवा गांव की महिलाएं पीढ़ियों से मौसमी मूंज घास की कटाई, उसे सुखाकर भंडारित करती आ रही हैं और उससे हाथ से बुने सजावटी सामान, कोस्टर, टोकरियां और अन्य उपयोगी बर्तन बनाती आ रही हैं। एक समय इस शिल्प का निर्यात से भी संबंध था। व्यापारी नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए स्टॉक इकट्ठा करते थे, लेकिन समय के साथ ये नेटवर्क कमजोर पड़ गए। लेकिन यहां की महिलाएं अपने दम पर इस संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रही हैं। वर्ष 2017-18 के आसपास हस्तशिल्प पर सरकार के बढ़ते ध्यान के साथ इसमें रुचि फिर से जागृत हुई। आज, चांद जैसी महिलाएं महिला कारीगरों के एक समूह के साथ मिलकर थोक ऑर्डर पूरे करती हैं। वे डिजाइन कार्यशालाओं, एक्सपोजर विजिट और टूलकिट उपलब्ध कराने के लिए ODOP को श्रेय देती हैं, जिससे उत्पादों की फिनिशिंग में सुधार और विविधता लाने में मदद मिली। इनके उत्पादों में दलिया (टोकरियां), रोटी के डिब्बे और पारंपरिक ‘मोनी’ शामिल हैं, जिनका उपयोग कभी शादी की रस्मों में किया जाता था। नए डिजाइन इनपुट के साथ, समकालीन विविधताएं अब आधुनिक बाजार की मांग को पूरा करती हैं। चांद अपनी बेटी को यह शिल्प सिखाने की योजना बना रही हैं, जिसमें शिक्षा के साथ-साथ कौशल विरासत में मिलना भी शामिल है, क्योंकि उनके लिए यह महज उत्पाद नहीं है, बल्कि उनकी पहचान और आजीविका है, जिसे पीढ़ियों से बुनाई करने वाले हाथों ने आकार दिया है।बता दें कि मूंज सर्दियों में काटी जाने वाली सुनहरी घास, मूंज को धूप में सुखाया जाता है, फिर उसे लचीला बनाने के लिए पानी में भिगोया जाता है और मशीनों के बिना, केवल हाथ के औजारों जैसे कासा (एक छोटी सुई) से बुनाई करके वस्तुएं बनाई जाती हैं। यह शिल्प घर से काम करने वाली महिला कारीगरों द्वारा संरक्षित है, जो उनकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है और आजीविका प्रदान करता है, खासकर महेवा और नैनी जैसे क्षेत्रों में। गौरतलब है कि मूंज एक प्रकार की जंगली घास है जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और नदियों के किनारे (जैसे गंगा और यमुना) प्रचुर मात्रा में उगती है। वैज्ञानिक रूप से इसे सैकरम मुंजा (Saccharum munja) या सरकंडा (Sarkanda) कहा जाता है।
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