मुशारी की चंचल देवी, एक ऐसा उद्यम चलाती हैं, जो पूरी तरह से पानी बचाने वाली फसल प्रणालियों और खेती के उन्नत तरीकों (intercropping) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, ताकि क्षेत्र में भूजल की कमी को कम किया जा सके। आइए जानते हैं विस्तार से।
बिहार के मुजफ्फरपुर के मुशारी इलाके की खास बात यह है कि यहां खेती के लिहाज से शानदार बदलाव हो रहे हैं। जी हां, मुशारी की चंचल देवी ने एक अद्भुत काम किया है। वह एक ऐसे उद्यम का संचालन करती हैं, जो पूरी तरह से पानी बचाने वाली फसल प्रणालियों और खेती के उन्नत तरीकों (intercropping) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, ताकि क्षेत्र में भूजल की कमी को कम किया जा सके। ऐसे क्षेत्र में जहां लोग पानी की ज्यादा खपत वाली धान-गेहूं की फसल चक्र पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, चंचल देवी ने ऐसे वैकल्पिक तरीके पेश किए हैं, जिनमें कम पानी की जरूरत वाली फसलों का इस्तेमाल होता है। वह पारंपरिक, ज्यादा सिंचाई वाले फसल चक्र को तोड़ने के लिए दालों (मसूर, चना), तिलहनों (सरसों) और जलवायु-अनुकूल मोटे अनाजों (millets) पर विशेष ध्यान देती हैं। उनका उद्यम खेती के रणनीतिक मिश्रित और रिले तरीकों को बढ़ावा देता है, जैसे गन्ने के साथ गेहूं या मक्के के साथ सरसों उगाने जैसे काम को और यह तरीका मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता को बढ़ाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि एक फसल लगभग मुफ्त में मिल जाती है,क्योंकि पानी और खाद का इस्तेमाल दोनों फसलों के लिए साझा रूप से होता है। बता दें कि मिट्टी से पानी के तेजी से वाष्पीकरण को रोकने के लिए, उनका नेटवर्क स्थानीय किसानों को 'संरक्षण कृषि' (conservation agriculture) का प्रशिक्षण देता है। इसमें फसलों के बचे हुए हिस्सों का इस्तेमाल 'मल्चिंग' के लिए किया जाता है, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और सिंचाई की जरूरत लगभग 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है। वहीं हजारों छोटे-छोटे खेतों में लगातार 'बाढ़ सिंचाई' (flood irrigation) के तरीके को बदलकर, उनका उद्यम गर्मियों के मौसम में क्षेत्र के ट्यूबवेल और स्थानीय जल भंडारों (aquifers) पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद करता है।
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