मध्य प्रदेश की अफ़साना बेगम ने खानुहा गांव की महिलाओं को हस्ताक्षर करना सिखाया है, आइए जानते हैं विस्तार से। अगर आप अनपढ़ हैं और सिर्फ अंगूठा लगाना जानती हैं, तो आपको कोई भी बेवकूफ बना सकता है, ऐसे में हो सकता है कि कोई आपकी जमीन अपने नाम धोखे से कर ले या फिर बाकी और भी चीजें कर लें, ऐसे में अगर आपके जीवन में कोई ऐसी प्रेरणा आये, जो आपकी पढ़ाई पर फोकस करे, तो इस बात को समझना जरूरी है कि उनकी इज्जत करनी बेहद जरूरी है। कुछ ऐसा ही काम मध्य प्रदेश की अफ़साना बेगम ने भी किया है, वह खानुहा गांव की रहने वाली हैं और वहीं उनका बचपन भी बीता, उन्होंने हमेशा देखा कि वहां की महिलाएं कुछ भी पढ़ नहीं पाती हैं और ऐसे में उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपने गांव की 80 प्रतिशत महिलाओं को अंगूठे के निशान की जगह हस्ताक्षर का इस्तेमाल करने में मदद करेंगी और इस तरह से उन्होंने अपनी मुहिम शुरू की। जी हां, उन्होंने जमीनी स्तर पर स्थिति को समझा और एक साक्षरता अभियान शुरू किया, जिसका मकसद महिलाओं को अपना नाम लिखना और सरकारी कागजों पर दस्तखत करना सिखाना था। यह आंदोलन महिलाओं को आर्थिक आज़ादी और आत्मनिर्भरता के ज़रिए सशक्त बनाने की उनकी बड़ी कोशिश का हिस्सा था; इसमें एक 'महिला साप्ताहिक हाट' (बाज़ार) बनाना भी शामिल था, जिससे सैकड़ों स्थानीय महिलाओं को कमाई करने में मदद मिली। पंचायत की लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं की अब किसी न किसी रूप में आमदनी होती है। गौरतलब है कि वर्ष 2021 में, 8वीं कक्षा के बाद की पढ़ाई के लिए सबसे नजदीकी विकल्प लगभग आठ किलोमीटर दूर था। कई लड़कियों के लिए, यह दूरी उनकी पढ़ाई के सफर का अंत बन जाती थी। ऐसे में उन्होंने इस बात पर खास ध्यान दिया कि लड़कियां स्कूल में बनी रहें और ऐसे स्थानीय इंतजाम किए जाएं, जिनसे शिक्षा ज्यादा आसानी से मिल सके। और पिछले पांच सालों में, इसके नतीजे अब दिखने लगे हैं। गांव की कम से कम छह लड़कियां अब सरकारी मदद वाले स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षिकाएं हैं, जबकि कई अन्य लड़कियां आगे की पढ़ाई कर रही हैं, जो परिवार कभी अपनी बेटियों को पढ़ने भेजने में हिचकिचाते थे, वे अब उन्हें पढ़ाई के लिए भेजने को ज्यादा राजी हैं। वाकई, वहां की महिलाओं के लिए एक नयी तस्वीर बदलने में मदद की है अफ़साना ने, उनका भविष्य उज्जवल होगा, इसकी पूरी उम्मीद है।
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