खेती में ग्रामीण महिलाएं अपने हुनर का परिचय दे रही हैं। खासतौर पर जैविक खेती को इससे काफी बढ़ावा मिल रहा है। छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिलाएं भी जैविक खेती को प्राथमिकता देते हुए इसका प्रचार लगातार कर रही हैं। छत्तीसगढ़ के एक खास गांव के 150 के करीब किसान जैविक खेती के लिए प्राकृतिक खाद को प्राथमिकता दे रहे हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
कोरबा जिले के करताला क्षेत्र में आदिवासी महिलाओं ने परिवार संभालने के साथ खेती में भी अपनी प्रमुख भूमिका निभाई है। खासबात यह है कि करताला क्षेत्र के करीब लगभग 20 गांवों के किसान प्राकृतिक खेती को अहम मानते हैं। विशेष तौर पर महिला किसानों ने इस तरफ अपने हाथ बढ़ाए हैं। इन महिला किसानों का मानना है कि उन्होंने रासयनिक खेती को अपने जीवन से बाहर कर दिया है और जैविक खेती को अपनाया है। इससे उन्हें कई तरह से फायदा पहुंच रहा है। हालांकि जैविक खेती करने के लिए महिला किसानों को खास तरह का प्रशिक्षण भी दिया गया है। खासतौर पर आदिवासी क्षेत्र की महिलाएं घर पर ही जैविक खेती के लिए उर्वरक तैयार करती हैं।
जैविक खेती के लिए खाद को तैयार करने के लिए महिलाएं गाय के मूत्र और गुड़ का इस्तेमाल कर रही हैं। इस उर्वरक को तैयार करने के लिए महिलाएं पानी के साथ बेसन और गुड़ भी मिलाया जाता है। इस मिश्रण को एक सप्ताह के लिए रखा जाता है और फिर प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाता है। इस खाद को तैयार करने के लिए महिलाएं इसे खेत तक पहुंचाती हैं और फिर किसान इसे खरीदते हैं और जैविक खेती के लिए इस्तेमाल करते हैं। किसानों को इस उवर्रक से खेती में काफी फायदा होता है और इसी को देखते हुए इस उर्वरक की मांग बढ़ी है। 20 से अधिक गांवों में इस उर्वरक का इस्तेमाल हो रहा है। इसमें लगातार बढ़त भी मिल रही है। इस खाद का उपयोग करते हुए मूंगफली, काला चना और ज्वार की खेती खासतौर पर की जाती है।