आप कभी ऐसी जगह जाएं, जहां आपको अपने चारों तरफ आप जहां भी नजर दौड़ाएं, केवल और केवल हर घर कलात्मक नजर आये, तो आपको जाहिर है, सुकून की अनुभूति होगी। झारखंड का एक ऐसा ही गांव है, जहां हर घर की दीवारों पर पेंटिंग हैं, आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित सोहराई' (Sohrai) और 'खोवर' पेंटिंग के लिए सबसे प्रसिद्ध और अनोखा गाँव चिरुडीह (Chiraundi) है, जिसे 'आर्टिस्ट विलेज' भी कहा जाता है। इस गांव में हर घर की दीवारों पर स्थानीय महिलाओं द्वारा पारंपरिक रूप से सोहराई कला उकेरी जाती है। हर घर की दीवार को स्थानीय महिलाओं ने 'GI-टैग वाली सोहराई' कला के कैनवस में बदल दिया है। जी हां, पारंपरिक रूप से सर्दियों की फसल से जुड़ा एक अनुष्ठान, यह पूरे समुदाय में फैला हुआ चलन है, जो पूरे गांव को एक शानदार, खुले आसमान के नीचे बनी आर्ट गैलरी में बदल देता है। सोहराई पूर्ण रूप से महिलाओं द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाई जाने वाली कला है। इसके जटिल डिजाइन, स्ट्रोक और जानवरों के पारंपरिक कला या चित्रकारी, सिर्फ मां से बेटी को ही सिखाई जाती है। ये महिलाएं अपनी जरूरत की हर चीज के लिए 100 प्रतिशत स्थानीय प्राकृतिक चीजों पर निर्भर रहती हैं। वे स्थानीय मिट्टी और खनिजों से चार मुख्य रंग बनाती हैं, जैसे कि सफेद मिट्टी (धुधा मिट्टी), लाल ऑक्साइड (गारू मिट्टी), पीली मिट्टी (खासी मिट्टी), और काली मिट्टी (काली मिट्टी)। वहीं नायलॉन के पेंटब्रश के बजाय, ये महिलाएं स्थानीय पेड़ों की चबाई हुई टहनियों (जैसे दातुन) या कपड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल करके दीवारों पर रंगों की पहली परत लगाती हैं और जानवरों के चित्र उकेरती हैं। यह कला प्रजनन क्षमता, अच्छी फसल के लिए आभार और इंसान और जानवरों के बीच के गहरे रिश्ते को दर्शाती है। दीवारों पर बनाए गए मुख्य चित्रों में पशुपति (जानवरों के देवता), कूबड़ वाले मवेशी, घोंसला बनाते पक्षी, मछलियां और कमल के फूल शामिल हैं। वहीं हजारीबाग में 'सोहराई कला महिला विकास सहयोग समिति' जैसे संगठनों ने इन महिलाओं की मदद की है, ताकि वे दीवारों पर बनाई जाने वाली इन कलाकृतियों को कैनवस, हाथ से बने कागज और साड़ियों पर भी बना सकें। इस तरह के व्यवसायीकरण से पर्यटक सीधे गांव की इन कलाकारों से असली आदिवासी डिज़ाइन खरीद पाते हैं, जिससे हजारों ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक आजादी मिली है।
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