ग्रामीण इलाकों में जलकुंभी को बेकार माना जाता है। नदियों और तालाबों में जलकुंभी को लेकर नकारात्मक भावनाएं रहती हैं। खासतौर पर जलकुंभी को जड़ से खत्म करने के लिए कई तरह की उपाय और योजना की जाती रही हैं। क्योंकि जलकुंभी नदी और तालाब में तेजी से फैलने लगता है, लेकिन गोरखपुर की महिलाओं ने इस जलकुंभी से रोजगार की शुरुआत की है और खुद को आर्थिक तौर पर प्रबल बनाने का कार्य किया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
गोरखपुर के एक समूह की महिलाओं ने जलकुंभी से सफल व्यवसाय की शुरुआत की है। एक आजीविका समूह से जुड़कर और ट्रेनिंग लेकर यह सभी महिलाएं 16 तरह के अलग सामान बनाती है, जो कि पर्यावरण के भी अनुकूल रहता है। यह सभी महिलाएं मिलकर इस जलकुंभी को नदी और तालाबों में से लेकर आती है और फिर उसकी अच्छी तरह से सफाई करती हैं। इसके बाद इस जलकुंभी के डलिया, टोपी, टी- कोस्टर, सब्जी रखने की टोकरी, हैंड बैग , पेन होल्डर , डिब्बा, पानी की बोतल और फोल्ड के साथ कई और भी तरह के घरेलू जरूरत के सामान बनाती हैं। दिलचस्प है कि यह सभी सामान एक तरह से पूरी तरह से इको-फ्रेंडली होने के साथ मजबूत होते हैं और साथ ही लंबे समय टिके रहते हैं।
हालांकि सर्दी के मौसम में जलकुंभी को निकालना और उसे सूखने में अधिक मेहनत लगती है। सर्दी के मौसम में जलकुंभी को सूखने में एक सप्ताह से अधिक का समय लगता है। गर्मी में एक दिन में जलकुंभी सूखने में एक दिन का समय लगता है। सूखने के बाद जलकुंभी को सीधा करके उसे आकार और डिजाइन किया जाता है। उल्लेखनीय है कि जलकुंभी से बने हुए कोस्टर और कैप की कीमत 350 रुपए के करीब है। पेन होल्डर 100 रुपए में, डैंडबैग को 350 रुपए में बेचा जाता है। पानी की बोतल रखने का डिब्बा 200 रुपए की कीमत पर बेचा दा रहा है, जो कि काफी किफायती है। इस तरह से गोरखपुर में एक साथ कई महिलाएं खुद के साथ परिवार की भी जिम्मेदारी संभाल रही हैं।