बाल विवाह एक प्रथा नहीं, बल्कि गंभीर परिणाम है, जो कि लड़कियों से उनका बचपन और हौसला छीन लेता है और इसी के खिलाफ आवाज उठाने का सराहनीय कार्य वाराणसी की श्रुति नागवंशी कई सालों से कर रही हैं। उल्लेखनीय है कि कम उम्र से ही श्रुति ने महिलाओं के उत्थान के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। ज्ञात हो कि बीते 30 सालों से दलित महिलाओं के साथ मिलकर उन्होंने बाल श्रम और महिलाओं को दिए जाने वाले सभी तरह के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद की है। श्रुति का कहना है कि महिलाओं से जुड़े उत्पीड़न के मामले छोटे या बड़े नहीं होते हैं, बल्कि पीड़ादायक होता है। आइए जानते हैं विस्तार से।
बनारस निवासी श्रुति नागवंशी ने कई दलित महिलाओं को नई जिंदगी दी है। उन्होंने कई साल पहले बाल श्रम को लेकर एक लड़ाई शुरू की और उसमें सफल भी रही और उसके बाद से ही लगातार उन्होंने बाल श्रम से लेकर बाल विवाह की जड़ को खत्म करने का कार्य किया है। उन्होंने लगभग 15 बाल विवाह को होने से रोका है। कई सारी छोटी लड़कियों के जीवन को वक्त से पहले शादी के अंधेरे से बाहर लाने का कार्य किया है। अपने पति के साथ मिलकर उन्होंने मानवाधिकार जन सतर्कता समिति की शुरुआत की। इसके साथ ही अपने सराहनीय कार्य के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता भी मिल चुकी है। साल 2016 में उन्हें भारत के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा शीर्ष 100 महिला अचीवर्स में भी शामिल किया गया। उन्हें लेनिन रघुवंशी के साथ मिलकर नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया जा चुका है। हालांकि बीते दो दशक से अपने इस कार्य को शुरू करने की प्रेरणा उन्हें बचपन में ही मिल चुकी है। वह कई सामाजिक कार्यों का हिस्सा बचपन से ही रही हैं। अपने करियर और जीवन में कई तरह की चुनौतियों के बाद भी उन्होंने लोगों के उत्थान के लिए किए गए कार्यों को हमेशा जारी रखा और अपना जीवन पूर्ण तरह से समर्पित कर दिया है। समाज के लिए अपनी इस सेवा पर श्रुति का कहना है कि उन्होंने तकरीबन 30 साल पहले इस काम को शुरू किया था और फिर मानवाधिकार जन निगरानी समिति के द्वारा बाल श्रम की लड़ाई शुरू की। उन्होंने कहा कि उनके अब तक के सफर में उन महिलाओं के सामने अपने अधिकारों के लिए बड़ा संकट था, जो खासतौर पर बस्तियों में रहती थीं। खासतौर पर इन महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना और अस्पताल जैसी सुविधा के लिए वह लगातार प्रयास कर रही हैं और सफल भी रही हैं।