आजादी के 80 वें साल में हम कदम रख चुके हैं। इसी के साथ महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन में प्रमुख रूप से शामिल खादी का असर हमारे जीवन पर अधिक होता जा रहा है। फैशन की दुनिया में जहां पर खादी को अहमियत और लोकप्रियता मिल रही है। ठीक इसी तरह खादी ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के रोजगार का भी हिस्सा बन गया है। बिहार के मोतिहारी के सुंदरपुर की महिलाएं चरखे का उपयोग करते हुए आत्मनिर्भरता की कहानी लिख रही हैं।
साथ ही अपने इलाके को खादी का ब्रांड बनाती जा रही हैं। बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में मौजूद सुंदरपुर गांव खादी को नई ऊंचाईयों तक लेकर जा रहा है। हाथ से बनी हुई खादी उनके जीवन को नई पहचान और दिशा दे रही है। इन महिलाओं ने खादी को आधुनिका बाजार तक तेजी से पहुंचाया है। सुंदरपुर गांव में पहले आर्थिक संपन्नता का माहौल नहीं था, यहां की महिलाओं ने खुद की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए उन चीजों का सहारा लिया, जो कि उनके पास मौजूद थी। इस गांव की आबादी लगभग 2 हजार के करीब है।
इस गांव की लगभग 500 महिलाएं खादी के कार्य से जुड़ी हुई हैं और खुद के परिवार को आर्थिक तौर पर संरक्षण भी दे रही हैं। इस गां की सरपंच राधा देवी का कहना है कि हमारे गांव में चरखा केवल घर में रखी जाने वाली एक वस्तु नहीं है, बल्कि यह आर्थिक होने का एक प्रतीक भी है। गांव की महिलाएं खुद खादी को बुनकर कमाई कर रही हैं। ज्ञात हो कि साल 2018 में राधा देवी ने सुंदरपुर खादी महिला समूह की स्थापना की थी। शुरुआत में केवल 20 महिलाएं इससे जुड़ीं और बाद में इसकी संख्या हजार के करीब हो गई है। महिलाओं को खादी बुनाई का पहल प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर काम दिया जाता है। महीने में महिलाएं इस काम से 12 से 15 हजार की रकम कमा लेती हैं।