कचरा कैफे भोपाल के लोगों की सोच स्वच्छता को लेकर पूर्ण रूप से बदल रहा है और इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं अंजीता। आइए जानते हैं विस्तार से।
फर्ज कीजिए, आप कचरों का ढेर लेकर कहीं जा रही हैं या जा रहे हैं और वहां आपको कचरे के बदले कुछ अद्भुत चीजें देखने को मिल रही हैं और आप इसे देख कर हैरान हो रहे हैं कि क्या ऐसा भी हो सकता है, तो जी हां, मध्य प्रदेश के भोपाल में कुछ ऐसा ही अनोखा हो रहा है, जहां अंजीता 'कचरा कैफे' के माध्यम से कुछ अनोखा सफाई आंदोलन चला रही हैं। अंजीता ने भोपाल में 'कचरा कैफे' शुरू किया। उल्लेखनीय है कि यह एक अनोखी पहल है, जहां लोग सूखा और रीसाइक्लेबल कचरा (प्लास्टिक, कागज, ई-वेस्ट आदि) जमा करते हैं और बदले में उन्हें स्वादिष्ट खाना, स्नैक्स या हस्तनिर्मित वस्तुएं (हैंडमेड आइटम्स) मिलती हैं। यह मॉडल भोपाल नगर निगम (BMC) और महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा चलाया जाता है। जान लें कि यहां लोग प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे, कागज, गत्ते, पुराने कपड़े या ई-वेस्ट जैसे करीब 19 प्रकार के साफ और अलग किए हुए कचरे को कैफे लेकर आते हैं। फिर कैफे में लाए गए कचरे को तौला जाता है और उसकी मात्रा या प्रकार के हिसाब से डिजिटल पॉइंट्स या कूपन दिए जाते हैं। फिर लोग इन कूपन या पॉइंट्स को आप कैफे में स्वादिष्ट नाश्ते, भोजन (जैसे छोले-चावल) या महिलाओं द्वारा बनाए गए सुंदर सजावटी सामान और थैलों के बदले में ले सकते हैं। गौरतलब है कि यह आप जान लें कि भोपाल का 'कचरा कैफे' कचरे से संसाधन बनाने की एक अनोखी और टिकाऊ पहल है। वह भोपाल में 'कचरा कैफे' पहल की दूरदर्शी संस्थापक और मुख्य सूत्रधार हैं। दरअसल, गौर करें तो उन्होंने इस सेंटर का लेआउट ऐसा बनाया है, जो लोगों को आकर्षित करे, ताकि यह कचरा इकट्ठा करने वाली जगहों के पारंपरिक और भद्दे रूप से अलग दिखे। वही अपने NGO 'मन्नत सोशल वेलफेयर' के जरिए, वह नागरिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम करती हैं, ताकि सामाजिक उद्यमिता को जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों (क्लाइमेट एक्शन) के साथ जोड़ा जा सके। बता दें कि अंजीता ने कैफे की सप्लाई चेन को इस तरह से तैयार किया है कि स्थानीय महिला स्वयं-सहायता समूहों को सीधे तौर पर सशक्त बनाया जा सके। खास बात यह है कि कचरा प्रबंधन के अलावा, ये महिलाएं स्नैक्स बनाती हैं और 'कचरा कॉइन्स' से खरीदे जाने वाले अपसाइकल किए गए उत्पाद तैयार करती हैं। साथ ही वह नियमित रूप से जागरूकता अभियान चलाती हैं, जैसे 'सस्टेनेबिलिटी पर यूथ डायलॉग'। इसके लिए वह UNICEF जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करती हैं ताकि युवा पीढ़ी के बीच सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर रोक लगाने को बढ़ावा दिया जा सके। वाकई, यह अद्भुत पहल है।
*Image used is only for representational purpose.