अगर हम अपने आस-पास देखें, तो ऐसी कई महिलाएं हैं, जिनसे आपको प्रेरणा लेनी चाहिए। आइए जानें विस्तार से।
फूल बेचने वालीं महिलाएं

सुबह-सुबह जब आप उठते हैं, तो आपकी यही चाहत होती है कि आप किसी ऐसे से मिलें, जिनके चेहरे पर स्माइल हो और मुस्कुराता हुआ उनका चेहरा हो, क्योंकि आपको पूरी उम्मीद रहती है कि आपका पूरा दिन बेहतर जाये, ऐसे में क्या आपने कभी फूलों को बेचने वाली महिलाओं की तरफ देखा है, वे किस उत्साह से हर दिन एक ही काम करते हुए, पूरे उत्साह से भरपूर रहती हैं और हमें जिंदगी को जीने का एक फलसफा सीखा देती हैं। भारत में फूल बेचने वाली महिलाओं से कई सबक सीखे जा सकते हैं, जिनमें उत्कृष्ट बिक्री कौशल से लेकर सूक्ष्म उद्यम की संरचनात्मक मजबूती तक शामिल है। उनकी सफलता व्यक्तिगत नेटवर्किंग और सूझबूझ के माध्यम से जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं का व्यवसाय खड़ा करने का एक खाका प्रस्तुत करती है। वह यह दर्शाती हैं कि बिक्री को एक रिश्ते के रूप में देखें, न कि सिर्फ एक लेन-देन के रूप में। महिला फूल विक्रेताओं को देखें, तो उनके चेहरे पर हमेशा ही एक सच्ची मुस्कान और हंसमुख व्यवहार उस ग्राहक को भी, जिसे फूल पसंद नहीं हैं, खरीदार में बदल सकता है। आप गौर करें, तो कई सड़क किनारे जो महिलाएं फूल बेचती हैं, वे बोली की धनी रहती हैं, वे कहती नजर आएंगी कि जितना आपको अच्छा लगे उतना भुगतान करें, इस मॉडल के उपयोग के पीछे उनकी सोच यही होती है कि उन्हें सद्भावना के कारण बार-बार आने वाले ग्राहक भी मिलते हैं। इसलिए इनसे आपको सीखना ही चाहिए कि जीवन में कई बार हो सकता है कि व्यक्तिगत जिंदगी में कोई परेशानी हो, लेकिन उसे कभी अपने जीवन पर हावी नहीं करना चाहिए। एक दिलचस्प जानकारी आपको जाननी ही चाहिए कि आंध्र प्रदेश के गांवों में महिलाओं ने महंगे बिचौलियों को दरकिनार करते हुए सीधे बाजार में बेचने के लिए अपने घरों के पिछवाड़े में उपलब्ध हर जमीन को फूलों के खेतों में बदल दिया।
हर सुबह लोकल ट्रेन या बस से सफर करने वालीं महिलाएं

मुंबई जैसे शहरों में, लोकल ट्रेनों के महिला डिब्बों में रोजाना आपको कई तरह से प्रेरणा। जैसे कि यात्रा करते हुए आप महसूस करें की सामुदायिक भावना और कार्य-जीवन संतुलन की कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वे भीड़ में अपने लिए जगह बनाने के लिए "अपनी लड़ाई खुद लड़ना" सिखाती हैं, जो पुरुष-प्रधान पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ने की सीख देता हुआ एक रूपक है। अगर आप माइक्रो टास्किंग करना पसंद करती हैं, तो आपके लिए यह बेस्ट जगह है, क्योंकि भीड़भाड़ वाली बस में या ट्रेन में खड़े होकर महिलाओं को रात के खाने के लिए सब्जियां काटते देखना आम बात है, ताकि वे घर पर समय बचा सकें। महिलाओं का डिब्बा अक्सर एक ‘एक्सटेनडेड परिवार’ बन जाता है, जहां अजनबी लोग जीवन भर के रिश्ते बना लेते हैं। ऐसी कई महिलाएं हैं, जिनका अपना ग्रुप है और वे एक दूसरे की सपोर्ट सिस्टम के रूप में काम करती हैं। जो महिलाएं पहले कभी नहीं मिली होतीं, वे सहज रूप से किसी अजनबी का बैग पकड़ लेती हैं, किसी बुजुर्ग यात्री को बैठने के लिए जगह देती हैं या किसी सहयात्री का ध्यान रखती हैं। ये महिलाएं जन्मदिन, दशहरा जैसे त्योहार और सेवानिवृत्ति की उपलब्धियों को सजावट और मिठाइयों के साथ नियमित यात्रियों के बीच मनाती हैं। यहां तक कि महिलाएं कपड़ों के फैब्रिक और गहनों से लेकर घर के बने स्नैक्स तक सब कुछ बेचती हैं, जिससे उन्हें आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत मिलता है और सीधे ग्राहकों को सामान बेचने का सबक भी मिलता है। इन डिब्बों में ऐसी कई बुजुर्ग महिलाएं भी आती हैं, जो दान मांगने के बजाय ट्रेनों में चूड़ियां या चिप्स जैसी साधारण चीजें बेचती हैं, उनकी कहानियां आत्म-सम्मान और दृढ़ता का एक सशक्त सबक देती हैं। महिलाओं के लिए यह एक विशेष स्थान में होने से मुक्ति का अनुभव हो सकता है, जिससे महिलाएं खुलकर बोल सकती हैं, अपने दुख साझा कर सकती हैं, या अपने सपनों को साकार करने के दौरान आशा की किरण का आनंद ले सकती हैं।
स्ट्रीट फूड/सब्जी या स्टॉल लगाने वालीं महिलाएं

भारत में, खाद्य स्टॉल या खाद्य व्यवसाय चलाने वाली महिलाएं घरेलू खाना पकाने से हटकर "फूडप्रेन्योर" बन गई हैं, और लगभग 900,000 सक्रिय स्ट्रीट फूड विक्रेता हैं। उनकी कहानियां पारंपरिक कौशल और आधुनिक व्यावसायिक रणनीति के संयोजन का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। आप गौर करें, तो कई सफल उद्यमियों ने पारिवारिक व्यंजनों को पुनर्जीवित करके शुरुआत की, जिन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादित ब्रांड दोहरा नहीं सकते। उदाहरण के लिए, पाटिल काकी (प्रामाणिक महाराष्ट्रीयन स्नैक्स) और छौंक (बिहारी व्यंजन) जैसे ब्रांड, दोनों ही घरेलू रसोई से शुरू होकर प्रामाणिक, "घरेलू" स्वाद पर ध्यान केंद्रित करते हुए करोड़ों के कारोबार में तब्दील हो गए। स्ट्रीट वेंडर अक्सर साधारण दिखने में आकर्षक या स्वास्थ्य संबंधी बदलाव करके आगे बढ़ते हैं। एक विक्रेता ने चुकंदर और पालक जैसे प्राकृतिक अर्क का उपयोग करके सादे मोमोज को "रंगीन स्नैक्स" में बदल दिया ताकि ग्राहकों का ध्यान आकर्षित किया जा सके।
ऊंचे पहाड़ों पर रहने वालीं मेहनतकश महिला

ए पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं का जीवन एक "हार्डशिप टू स्ट्रेंथ" का बेहतरीण उदाहरण हैं। पहाड़ी महिलाएं रोजाना कई किलोमीटर ढालन और चढ़ाई पर चलते हुए भारी बोझ (लकड़ी, पानी या चारा) उठती हैं। हम इन महिलाओं से सीख सकते हैं कि असली फिटनेस जिम में नहीं, बल्कि मुश्किल हालात में काम करने से आती है। उनकी सहनशक्ति और "हार ना मानें " वाली भावना हमें मानसिक अनुशासन सिखाती हैं। वो लोग प्रकृति के साथ मिलकर रहती हैं और वो संसाधनों को बर्बाद नहीं करतीं और मौसम के हिसाब से जीना जानते हैं।हम उनसे न्यूनतमवाद सीख सकते हैं , यानी संसाधनों में एक खुशहाल जीवन बिताना और पर्यावरण की इज्जत करना। हम सीख सकते हैं कि मुश्किल समय में समुदाय का सहारा कितना जरूरी है। गौर करें, तो पहाड़ियों में बाजार हमेशा पास नहीं होता, इसलिए वहां कीमहिलाएं खेती, पशुपालन (पशुपालन), और घर के सारे बड़े काम खुद करती हैं। उनसे आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए।
गांव की महिला-उद्यमी से सीख

इन दिनों गांव की महिलाएं लगातार उद्यमी बन रही हैं और वे हमें कई रूप में प्रेरणा देती हैं कि अगर आप कुछ करना चाहती हैं, तो इसके लिए जगह छोटा बड़ा या शहर बड़ा छोटा होना मायने नहीं रखता है। आपके लिए मायने रखता है। अगर आपका उत्पाद अच्छा है और आपका व्यवहार (ग्राहक संबंध) मजबूत है, तो लोग खुद-ब-खुद आपके बारे में बताएंगे। बिजनेस शुरू करने के लिए महंगे सेटअप की नहीं, बल्कि क्रिएटिव सोच की जरूरत होती है। जो पास में है, उसी से शुरू करो। ये महिलाएं यह भी सिखाती हैं कि छोटी-छोटी बचत ही आगे चलकर बड़ी पूंजी बनती है। नकदी प्रवाह प्रबंधन उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। साथ ही ये भी सिखाती हैं कि असली सफलता वही है, जहां आप दूसरों के लिए रोजगार पैदा करें। नेटवर्किंग और सहयोग ही विकास का रास्ता है। यह भी बतलाती है कि समस्या हर व्यवसाय में आएगी, लेकिन निरंतरता ही फर्क पैदा करती हैं।
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