रोटी की अगर कहानी की बात की जाये, तो भारत में इसका इतिहास और इसे खाने की संस्कृति के कई रोचक पहलू हैं। आइए जानते हैं विस्तार से।
क्या रहा है इतिहास

भारत में रोटी का इतिहास 5,000 वर्षों से भी अधिक पुराना है, जिसकी उत्पत्ति प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी हुई है। हालांकि इसे खाने की शुरुआत कहां से हुई, इसकी जानकारी को लेकर काफी मतभेद चलते रहते हैं। लेकिन साधारण भुने हुए आटे से बनी रोटी आज भारतीय घरों का मुख्य भोजन बन चुकी है और कई सालों से खाई जा रही है। आयुर्वेद जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में अनाज को पानी में मिलाकर और उन्हें चपटी डिस्क में बेलकर उनके पोषण संबंधी लाभों को बढ़ाने की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। 'रोटी' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द 'रोटीका' से हुई है, जिसका उल्लेख 16वीं शताब्दी के चिकित्सा ग्रंथ 'भवप्रकाश' में मिलता है। इससे पहले, 10वीं से 18वीं शताब्दी के बीच कन्नड़ साहित्य में भी इसी प्रकार के गेहूं से बने व्यंजनों का उल्लेख मिलता है। मुख्य रूप से साबुत गेहूं के आटे से बनी यह बिना खमीर वाली रोटी दक्षिण एशिया में आहार का एक अभिन्न अंग है, जो फुल्का यानी फुला हुआ, तंदूरी और रुमाली जैसे विभिन्न रूपों में पाई जाती है। तकनीकी रूप से यह पोषक तत्वों से भरपूर भोजन है, जिसमें वसा कम और फाइबर अधिक होता है, और प्रति रोटी में 80-120 कैलोरी होती है।
प्रेम और जुड़ाव का प्रतीक
अगर हम भारतीय घरों की बात करें, तो रोटी बनाना यहां की संस्कृति का एक हिस्सा है, जो समर्पण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें माताएं और दादी-नानी ‘निस्वार्थ स्नेह’ के साथ रोटी पकाती हैं, जो एक ऐसा आरामदायक भोजन है, जो लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ता है। प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता में निहित, आटे से रोटी बनाने की परंपरा एक गहरी जड़ें जमा चुकी प्रथा है, जिसका उपयोग अक्सर धार्मिक समारोहों में और लंगर में एक पवित्र प्रसाद के रूप में किया जाता है। दरअसल, एक साथ बनाना और विशेष रूप से रोटियां बांटना, सामाजिक और पारिवारिक बंधनों को मजबूत करता है, समुदाय और आतिथ्य पर जोर देता है।
पंजाब और राजस्थान

पंजाब में रोटियां काफी खाई जाती है। खासतौर से पंजाब में मक्की दी रोटी (मक्की दी रोटी) खूब खाई जाती है और यह मसाले के साग के साथ खाई जाती है और मिस्सी रोटी, जो बेसन और स्वाद से बनी है, यहां काफी खाई जाती है। मुख्य रूप से राजस्थान में यह बाजरे की रोटी और खोबा रोटी (खोबा रोटी) खाई जाती है। मोटी रोटी काफी मोटी होती है और इस पर अंगूठों का डिजाइन बनाया गया है, ताकि घी अच्छी तरह अंदर जा सके।
बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश
इन प्रदेशों में हर रोज रोटियां बनाई जाती हैं, और इन्हें कई अलग नामों से भी जाना जाता है। खास बात यह है कि इसे गेहूं के आटे से बनाया जाता है और तवे पर पकाया जाता है। चपाती शब्द हिंदी भाषा से आया है, जिसका अर्थ है थप्पड़ मारना। इसे चपाती इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसे बनाते समय आटे को हाथों के बीच थपथपाया जाता है। यह गोल, चपटी, बिना खमीर वाली रोटी होती है। झारखंड में चिल्का रोटी भी बनती है।
कर्नाटक और दक्षिण भारत

अक्की रोटी बेहद शौक से खाई जाती है और यह कर्नाटक के प्रसिद्ध व्यंजनों में से एक है। अक्की का अर्थ है चावल, और यह रोटी चावल के आटे से बनाई जाती है। इसमें सिर्फ चावल का आटा ही नहीं, बल्कि कद्दूकस की हुई सब्जियां और ढेर सारे मसाले भी डाले जाते हैं। इसे चटनी के साथ परोसा जाता है और इसके साथ और कुछ भी आवश्यक नहीं है। केरल में अप्पम इस अंदाज में बनता है। बता दें कि दक्षिण भारत के हैदराबाद में बता दें कि यह एक पतली, नरम रोटी है, जिसे रुमाल की तरह मोड़ा जा सकता है। यह रोटी अवधी, मुगलई और हैदराबादी व्यंजनों में काफी लोकप्रिय है। यह गेहूं और मैदे के आटे से बनी होती है और सफेद रंग की होती है। यह ग्रेवी के साथ सबसे अच्छी लगती है।
महाराष्ट्र और गुजरात
महाराष्ट्र में रोटी नहीं चपाती बोलने का चलन है और रोटी में हल्का-सा गई लगाने का भी चलन है। वहीं, यहां बाजरा और ज्वार के दो अलग-अलग प्रकार के आटे से बनाई जाती है। आटे के साथ-साथ इसमें चावल, चना, और मसाले भी डाले जाते हैं। कुछ लोग इसमें सब्जियां भी मिलाते हैं, जिससे यह पौष्टिक और सेहतमंद बन जाती है। थालीपीठ को दही या घी के साथ परोसा जाता है। यह कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी बहुत लोकप्रिय है। इसे यहां भाकड़ी भी बोला जाता है और चावल की रोटियां भी यहां बनती हैं। वहीं यहां व्रत में बक वीट के आटे और आलू से बनाया जाता है। इस रोटी की सबसे अच्छी बात यह है कि यह ग्लूटेन-मुक्त है, जो इसे और भी स्वास्थ्यवर्धक बनाती है। वहीं गुजरात में थेपले खूब खाये जाते हैं।