दिलचस्प है कि हिंदी साहित्य ने एक तरफ जहां महिला साहित्यकारों की लेखनी का वर्चस्व देखा है, तो इसी के साथ साहित्य के पन्नों में बढ़ता हुआ घरेलू महिलाओं का कद भी देखा है। भारतीय घरों में घरेलू महिलाएं न सिर्फ रसोई और परिवार की जिम्मेदारी संभालती हैं, बल्कि उनकी आंखों में कहीं न कहीं परंपराओं और रीति रिवाजों की बेड़ियां भी कई बार दिखाई देती हैं। उनके कंधों को हौसले की जरूरत होती है और उनके पैरों को उड़ान चाहिए होती है। हिंदी साहित्य ने घरेलू महिलाओं को उनका यह अधिकार अपनी लेखनी में दिया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
प्रेमचंद के साहित्य में घरेलू महिला

प्रेमचंद के समय की घरेलू महिलाएं आर्थिक तौर से पुरुष पर निर्भर थी। उनका जीवन विवाह, परिवार और समाज के नियमों में बंधा हुआ है। उनके कहानियों में महिलाएं जीवन का अभाव, त्याग, अपमान और मानसिक पीड़ा से भरा हुआ दिखाई देता है। प्रेमचंद के उपन्यास निर्मला में घरेलू महिला सामाजिक व्यवस्था का शिकार हुई हैं। प्रेमचंद के साहित्य में निर्मला एक घरेलू महिला है, जो उम्र में बड़े पति से विवाह के बाद संदेह, मानसिक उत्पीड़न और पारिवारिक त्रासदी का शिकार होती है। वह न तो विद्रोह कर पाती है और न ही अपनी पीड़ा खुलकर व्यक्त कर पाती है। बहुत ही दिलचस्प तरीके से प्रेमचंद यहां पर महिला को आरोपों के घेरे से बाहर रखते हैं। उन्होंने समाज के उन नियमों के खिलाफ आवाज उठाई है, जो कि महिलाओं को केवल एक सामान की तरह समझते हैं। दहेज, असमान विवाह और पितृसत्तात्मक सोच को जिम्मेदार ठहराते हैं। निर्मला की चुप्पी उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी विवशता का संकेत है। निर्मला के अलावा प्रेमचंद की सेवासदन की सुमन के साथ गृहद’ की गृहिणी परिवार की जिम्मेदारियों से दबी हुई है, फिर भी अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती। ‘पूस की रात’ में हल्कू की पत्नी मुन्नी आर्थिक अभाव में भी व्यावहारिक बुद्धि और धैर्य का परिचय देती है।‘कफन’ में बुधिया की अनुपस्थिति भी बहुत कुछ कह जाती है।
महादेवी वर्मा के साहित्य में घरेलू महिलाएं

महादेवी वर्मा के साहित्य में घरेलू महिलाएं केवल गृहिणी नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, मानसिक उपेक्षा और आत्मसंघर्ष की प्रतीक बनकर उभरती हैं। महादेवी वर्मा ने घरेलू स्त्री के मौन को भाषा दी और उसकी पीड़ा को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। महादेवी वर्मा ने साफ तौर पर कहा है कि घरेलू महिला की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसका श्रम और त्याग स्वाभाविक मान लिया गया है। अपनी लेखनी में महिलाओं की स्थिति पर गहरी पीड़ा व्यक्त करती हैं और महिला की आजाद चेतना की आवश्यकता पर बल देती है। महादेवी वर्मा के काव्य में घरेलू महिला का आत्मसंघर्ष दिखाई देता है।महादेवी वर्मा के साहित्य में घरेलू महिलाओं की स्थिति पुरुष-केंद्रित सामाजिक व्यवस्था की आलोचना के रूप में सामने आती है। वे यह प्रश्न उठाती हैं कि जिस स्त्री पर पूरा घर टिका है, उसे ही सबसे कम महत्व क्यों दिया जाता है? कुल मिलाकर देखा जाए, तो महादेवी वर्मा की घरेलू महिला विद्रोही नहीं बल्कि सजग हैं।
कृष्णा सोबती के साहित्य में घरेलू महिलाएं

उल्लेखनीय है कि कृष्णा सोबती के साहित्य में घरेलू महिलाएं एक आजाद चेतना, देह और भाषा के साथ मौजूद दिखाई देती हैं। सोबती ने अपनी लेखनी में महिलाओं को घर के अंदर लेकिन आजाद रखा है। उनकी लेखनी की महिलाएं परंपरा से टकराती हैं, संबंधों पर सवाल उठाती हैं, साथ ही अपनी सीमाएं खुद तय करती रहती हैं। देखा जाए, तो कृष्णा सोबती की लेखनी की महिलाएं निर्णायक भूमिका में दिखाई देती हैं। उनकी रचनाओं में गृहिणी स्त्री पति, परिवार और समाज से संवाद करती है, जैसे कि कभी टकराव में, कभी समझौते में, पर हमेशा आत्मसम्मान के साथ। मित्रो मरजानों की मित्रो इच्छा और यौन पर खुलकर बात करती हैं। डार से बिछुड़ी में स्त्री का जीवन सामाजिक बंधनों, रिश्तों और परंपराओं से उलझा हुआ है।ज़िंदगीनामा में ग्रामीण जीवन की अनेक घरेलू स्त्रियाँ हैं, जो चुपचाप घर संभालती हैं, पर उनके निर्णय पूरे समुदाय को प्रभावित करते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए, तो कृष्णा सोबती के साहित्य में घरेलू महिलाएं सीमाओं में रहकर भी सीमाओं को तोड़ने वाली महिलाएं हैं।
मन्नू भंडारी की लेखनी में घरेलू महिलाएं

मन्नू भंडारी की लेखनी में घरेलू महिलाएँ न तो देवी हैं और न ही विद्रोही नायिकाएँ, बल्कि वे सामान्य स्त्रियाँ हैं जो असामान्य परिस्थितियों में जी रही हैं। मन्नू भंडारी की स्त्रियां घर के भीतर रहते हुए भी मानसिक स्तर पर संघर्ष करती हैं और अपने अस्तित्व को बचाए रखने का प्रयास करती हैं। आपका बंटी मन्नू भंडारी का सबसे चर्चित उपन्यास है। मां का मौन, उसकी ग्लानि और उसका असमंजस घरेलू स्त्री की मानसिक स्थिति को उजागर करता है। मन्नू भंडारी की कहानियों में घरेलू महिलाएँ बहुत सजीव और वास्तविक रूप में उपस्थित हैं। इन स्त्रियों का विद्रोह तीखा नहीं है। वे घर तोड़ती नहीं, पर भीतर ही भीतर टूटती हैं। कुल मिलाकर देखा जाए, तो मन्नू भंडारी ने घरेलू महिला के मानसिक संसार को साहित्य में शामिल करते हुए नई गरिमा प्रदान की है।
उषा प्रियंवदा की लेखनी में घरेलू महिलाएं
उषा प्रियंवदा की लेखनी में घरेलू महिलाएं शोर नहीं मचाती हैं, बल्कि विद्रोह के नारे नहीं लगातीं, बल्कि चुपचाप अपने भीतर टूटती-बनती हुई दिखाई देती हैं और यही चुप्पी उनके जीवन को गंभीर बनाती है।लेखिका यह दिखाती हैं कि आधुनिक शहरी जीवन में घरेलू स्त्री की समस्या केवल आर्थिक निर्भरता नहीं, बल्कि मानसिक उपेक्षा है। यह उपेक्षा उसे धीरे-धीरे भीतर से तोड़ देती है। उल्लेखनीय है कि उषा प्रियंवदा ने घरेलू महिलाओं की चुप्पी और अकेलेपन को केंद्र में रखा हुआ है। उषा प्रियंवदा की घरेलू महिलाएँ शोर नहीं करतीं। वे छोटे-छोटे समझौतों, उपेक्षा और अकेलेपन को भीतर संजोए रहती हैं। उनका संघर्ष चुप है, पर तीखा। पति, परिवार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच रहते हुए भी ये महिलाएं अक्सर अकेलापन महसूस करती हैं। विवाह और गृहस्थी उन्हें सुरक्षा तो देती है, पर पूर्णता नहीं। उषा प्रियंवदा की स्त्रियाँ विद्रोह नहीं करतीं, लेकिन भीतर ही भीतर प्रश्न उठाती हैं। यह नारीवाद आक्रामक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक और आत्ममंथन से भरा है।