फरवरी का माह हिंदी साहित्य के पन्नों में खास स्थान रखता है। इसकी वजह है महान और लोकप्रिय कवि प्रदीप। हिंदी साहित्य के साथ सिनेमा के पटल पर भी प्रदीप ने अपनी कलम का जादू बिखेरा। कवि प्रदीप को न केवल रचनाकार माना गया है, बल्कि उन्हें पूरे युग की चेतना से जोड़़ा गया है। इसलिए कवि प्रदीप को अमर रचनाकार की उपाधि मिली हुई है। कवि की सबसे बड़ी पहचान उनकी ईमानदारी होती है, इसी विचारधारा पर कवि प्रदीप ने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। 5 जनवरी को उनका जन्म दिवस कवि प्रदीप दिवस के रूप में साहित्य की दुनिया में दर्ज किया गया है। आइए जानते हैं विस्तार से।
रामचंद्र द्विवेदी से कवि प्रदीप बनने का सफर
कवि प्रदीप का मूल नाम रामचंद्र द्विवेदी था। उन्होंने उस वक्त कलन की ताकत दिखाई,जब अंग्रेजी हुकूमत का अन्याय राष्ट्रीय एकता को संकट में ला रहा था। कवि प्रदीप ने जनता की आवाज बनने का फैसला किया। उन्होंने अपने गीतों से क्रांति लाई। कवि प्रदीप की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी रचनाएँ आम आदमी तक सीधे पहुँचती थीं। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन भाव असाधारण रूप से गहरे। वे शास्त्रीय जटिलताओं में उलझे बिना सीधे हृदय से संवाद करते थे। इसी वजह से उनके गीतों को न सिर्फ गाया गया बल्कि जनता ने उसे जिया भी है।युवावस्था में वे आर्य समाज और स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित हुए। इसी दौर में उनके भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना प्रखर होती चली गई, जो आगे चलकर उनकी रचनाओं की आत्मा बनी।कवि प्रदीप ने लेखन की शुरुआत ब्रज और खड़ी बोली में कविता से की। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे कवि के रूप में बनने लगी जो सरल भाषा में गहरे विचार प्रस्तुत करता था।
लोकप्रिय गीत
कवि प्रदीप के कई सारे लोकप्रिय गीत है, लेकिन एक गीत ऐसा है, जो कि भारत माता के दिल में बसता है। हर भारतवासी की जुबान पर है। ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी , जी हां, कवि प्रदीप का यह गीत देशभक्ति के स्वरूप को जाहिर करता है। एक शहीद के जीवन को दर्शाता है। शहीदों के लिए श्रद्धांजलि गीत है। इस गीत को इतने सालों बाद सुनकर भी आंखें भर आती हैं। यह उनकी कलम का ही कमाल है कि यह गीत हमारी भावनाओं के सागर से होते हुए आज भी आंखों में नमी लेकर आता है। यह कवि प्रदीप के शब्दों की ताकत ही है। आजादी से पहले जब स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था, तब उन्होंने अपनी कलम की धार से लिखा था कि दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है। कवि प्रदीप ने कभी तलवार नहीं उठाई, लेकिन उनकी कलम तलवार से कम नहीं थी। वे जानते थे कि विचारों की लड़ाई सबसे लंबी होती है, और अपनी कलम और शब्दों से उन्हें इस लड़ाई को स्वरूप दिया।
हिंदी सिनेमा के प्रदीप
हिंदी सिनेमा के पर्दे पर भी कवि प्रदीप की कलम की धार सदाबहार रही। सिनेमा में एक दौरा ऐसा आया, जब देशभक्ति का रंग फैलने लगा। इस दौरान कवि प्रदीप ने फिल्म किस्मत, बंधन, नास्तिक और उपहार जैसी फिल्मों के गीत लिखे, जो कि आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने लगभग 50 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं। उनके लिखे हुए गीतों की खूबी यह रही है कि सरल भाषा होने के कारण आम जनता तक पहुंचे। दिल को छू लेने वाली पंक्तियां, त्याग, बलिदान, समाज से जुड़ने वाली रही हैं। उन्होंने अपने गीतों से मानवता का संदेश दिया है।
पुरस्कार और सम्मान
कवि प्रदीप को अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए कई सारे पुरस्कार मिले हैं। साहित्य और सांस्कृतिक सम्मान के साथ उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार 1997 में मिला।
कवि प्रदीप की लोकप्रिय कविता गीत का सार
दे ही हमें आजाद बिना खड्ग बिना ढाल- महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन को समर्पित गीत है। इसमें बताया गया है कि भारत को स्वतंत्रता हथियारों से नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा, त्याग और नैतिक बल से मिली।
आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है गीत का सार
इस गीत में भारत की अखंडता, स्वाभिमान, वीरता और आत्मविश्वास को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है। कवि इस गीत के माध्यम से पूरे विश्व को यह संदेश देते हैं कि भारत शांतिप्रिय अवश्य है, लेकिन कमजोर नहीं है। गीत में हिमालय को भारत के गौरव, शक्ति और अडिग संकल्प का प्रतीक माना गया है।
चलो चले मां, सपनों के गांव में कविता का सार
यह कविता कवि प्रदीप की अत्यंत भावुक और करुणा से भरी रचना है। इसमें एक बच्चे की आवाज़ के माध्यम से माँ–बेटे के स्नेह, गरीबी, असहायता और सपनों की दुनिया का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह कविता बताती है कि जब समाज इंसान को सम्मान और सुरक्षा नहीं देता है, तब सपने ही उसका सहारा बन जाता है।
ओ दुनिया के रखवाले गीत का सार
गीत में कवि कहता है कि यदि ईश्वर इस दुनिया का रक्षक है, तो फिर इतनी पीड़ा, अन्याय और दुख क्यों हैं। गरीब, असहाय और मासूम लोग क्यों कष्ट झेल रहे हैं, जबकि दुष्ट और अत्याचारी सुखी दिखाई देते हैं। यह गीत मनुष्य की व्यथा और ईश्वर से शिकायत का प्रतीक है।