ज्ञानरंजन के साहित्य की बात करें, तो उन्होंने कम लिखा है, लेकिन काफी यादगार लिखा है। उनका हाल ही में निधन हुआ, लेकिन उनका लेखन हमेशा ही यादगार माना जायेगा। आइए जानें विस्तार से।
कौन हैं ज्ञानरंजन
ज्ञानरंजन (1936-2026) हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कथाकार और 'पहल' पत्रिका के संपादक थे, जिनका जन्म महाराष्ट्र के अकोला में हुआ, उच्च शिक्षा इलाहाबाद से ली और जबलपुर के जीएस कॉलेज में प्रोफ़ेसर रहे। वे 'साठोत्तरी पीढ़ी' के महत्वपूर्ण लेखक थे, अपनी कहानियों (जैसे 'कबाड़खाना') और तीखी सामाजिक दृष्टि के लिए जाने जाते थे, तथा उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया।
लेखन शैली
उल्लेखनीय है कि उनकी कहानियाँ सामाजिक यथार्थ, पारिवारिक विघटन और मानवीय संबंधों की बारीक पड़ताल करती हैं और साथ ही साथ उन्होंने कहानी की संरचना और भाषा में नयापन लाया। बता दें कि 'कबाड़खाना', 'फेंस के इधर और उधर', 'क्षणजीवी', 'सपना नहीं' हमेशा प्रासंगिक रहेंगी।
सम्मान
अगर सम्मान की बात करें, तो जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे और 1996 में सेवानिवृत्त हुए, वहीं उन्होंने 'सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड', 'साहित्य भूषण सम्मान', 'मैथिलीशरण गुप्त सम्मान', 'शिखर सम्मान' सहित कई सम्मान प्राप्त किए। तो यह भी उल्लेखनीय बात रही है कि आपातकाल के विरोध में मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग का एक पुरस्कार और मुक्तिबोध फेलोशिप ठुकरा दी थी।
ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’
गौरतलब है कि ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता' दो पीढ़ियों (पिता और पुत्र) के बीच के द्वंद्व, पुरानी और नई सोच के टकराव और आधुनिक जीवनशैली से तालमेल बिठाने में असमर्थ एक पिता के दर्द को दर्शाती है, जहाँ पिता पुरानी पीढ़ी के प्रतीक हैं, जो नई सुविधाओं से दूर रहते हैं, जबकि बेटा उन्हें आधुनिक बनाना चाहता है, पर दोनों के बीच घृणा नहीं, बल्कि पीढ़ीगत अंतर का सहज चित्रण है, जो पारिवारिक रिश्तों की जटिलता दिखाई देती है। कहानी में एक पिता और पुत्र के रिश्ते के माध्यम से पुरानी और नई पीढ़ी की सोच के अंतर को दिखाया गया है, जहाँ पिता अपने पुराने तौर-तरीकों पर अड़े हैं और बेटा उन्हें आधुनिक बनाना चाहता है।इस कहानी में पिता के चरित्र की बात करें, तो पिता पुरानी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जो आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर रहते हैं और बदलते समय के साथ चल पाने में असमर्थ महसूस करते हैं, जिससे उनके भीतर एक अकेलापन और दर्द है। वहीं पुत्र चाहता है कि उसके पिता भी आधुनिक जीवनशैली अपनाएं और आराम करें, लेकिन पिता अपनी आदतों और विचारों से चिपके रहते हैं, जिससे दोनों के बीच एक दूरी बन जाती है। बात अगर रिश्तों की जटिलता की करें, तो यह कहानी नफरत या उपेक्षा की नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच के स्वाभाविक अंतर और उनके बीच पनपते द्वंद्व की है, जो भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में अक्सर देखने को मिलता है। वहीं ज्ञानरंजन ने इस कहानी में मध्यवर्गीय जीवन की सच्चाइयों, पारिवारिक रिश्तों की कुरूपता और सूक्ष्म भावनात्मक द्वंद्वों को तटस्थता से चित्रित किया है, जो उनकी खास विशेषता है। संक्षेप में, 'पिता' ज्ञानरंजन की एक मार्मिक और यथार्थवादी कहानी है जो पारिवारिक रिश्तों में पीढ़ीगत बदलावों और उनके सूक्ष्म अंतर्विरोधों को खूबसूरती से दर्शाती है।
ज्ञानरंजन की कहानी ‘घंटा’
अगर हम ज्ञानरंजन की कहानी 'घंटा' की बात करें, तो यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो 'पेट्रोला' नामक एक शराबी और तिरस्कृत जगह पर कुंदन सरकार जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के साथ दोस्ती करता है, जहाँ उसे 'घंटा' (मनोरंजन का साधन) बनाकर इस्तेमाल किया जाता है, और कहानी उसके भीतर के अंतर्द्वंद्व, अपमान और स्वायत्तता की इच्छा को दर्शाती है, जो शक्ति-संबंधों और सामाजिक उपेक्षा के यथार्थ को उजागर करती है। अगर हम स्थान और पात्र की बात करें, तो कहानी 'पेट्रोला' नामक एक गुमनाम, सामाजिक रूप से तिरस्कृत जगह पर केंद्रित है, जहाँ शराब, नशा और हाशिए के लोग मिलते हैं। तो इसके मुख्य पात्र, जो कथावाचक है, वहाँ 'कुंदन सरकार' नामक एक शक्तिशाली व्यक्ति से दोस्ती करता है। वहीं अगर विषय वस्तु की बात करें, तो कुंदन सरकार कथावाचक को 'घंटा' कहकर पुकारता है और उसे अपने मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करता है। कहानी दिखाती है कि कैसे यह मित्रता एक असमान शक्ति-संबंध में बदल जाती है, जिससे कथावाचक के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचती है और वह अपनी स्वायत्तता की तलाश करता है। शैली और विशेषता की बात करें, तो यह कहानी आत्म-चरित्र प्रधान शैली में लिखी गई है, जहाँ कथावाचक स्वयं अपनी कहानी सुनाता है। यह व्यक्ति के भीतर के संघर्ष, सामाजिक विडंबनाओं और मध्यवर्गीय जीवन के यथार्थ को दर्शाती है।
ज्ञानरंजन की कहानियों की विशेषताएँ
अगर हम ज्ञानरंजन की कहानियों की विशेषता की बात करें, तो मध्यवर्गीय यथार्थ में उनकी कहानियाँ मध्यम वर्ग के रोजमर्रा के संघर्षों, सपनों और निराशाओं को उजागर करती हैं, जैसे 'पिता' कहानी में एक पिता-पुत्र के अनकहे रिश्ते और आर्थिक दबाव का चित्रण है। वे पात्रों के मन की गहराइयों में उतरकर उनकी आंतरिक दुनिया को चित्रित करते हैं, जिससे उनकी कहानियों में एक खास मनोवैज्ञानिक परत जुड़ जाती है। वे'टेढ़ा रास्ता' जैसी कहानियों में कस्बों और शहरों के बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य और उसमें फंसे लोगों की कहानी है। साथ ही भाषा और शैली के लिहाज से उनकी कहानी कहने की भाषा और तेवर में बदलाव लाया, जिससे हिंदी कहानी को एक नई दिशा मिली, जिसमें ललित निबंधों का भी कौशल झलकता है।