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गांव की छांव में बसे हिंदी साहित्य में ग्रामीण संवेदनाएं समाई

टीम Her Circle |  January 24, 2026

यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि हिंदी साहित्य का जुड़ाव कहीं न कहीं से गांव में बसा हुआ है। भारत गांव का देश रहा है। वहां की सभ्यता और संस्कृति से मिट्टी की खुशबू आती है। हिंदी साहित्य की जड़ें भी खेती, खलिहानों, चौपालों ,मेलों, लोकगीतों और ग्रामीण संवेदनाओं में गहराई से समाया हुआ है। हिंदी साहित्य में एक नहीं बल्कि कई दफा गांव को केवल जीवंत पात्र के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। आइए जानते हैं विस्तार से।

गांव पर आधारित हिंदी साहित्य के नाम

गांव पर कई सारे हिंदी साहित्य मौजूद हैं। इनमें सबसे प्रमुख नाम और सबसे पहले नाम गोदान का आता है। गोदान में गांव को जैसा है वैसा ही रखने की सरल कोशिश की गई है। प्रेमचंद ने गाँव को न तो आदर्श स्वर्ग की तरह दिखाया है और न ही केवल अँधेरे से भरा हुआ है, बल्कि जैसा वह सच में है, वैसा ही सामने रखा है। गांव को गरीबी और शोषण का केंद्र भी बताया गया है। यहां पर गांव किसान की बदहाली का प्रतीक है। यहां पर गांव का जीवन लगातार आर्थिक दबाव में दिखाया गया है। जाति-प्रथा, ऊँच-नीच, पंचायत का अन्याय, स्त्रियों की दुर्दश और ये सब गाँव के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनकर सामने आते हैं। गोदान में गांव समाज की रूढ़िवादी सोच को उजागर करता है। उन्होंने गोदान में प्रकृति से जुड़ाव भी दिखाया है। उन्होंने बताया है कि गाँव का जीवन खेती, मौसम, पशु और जमीन से जुड़ा हुआ है। किसान की खुशियाँ और दुख फसल पर निर्भर हैं, जिससे प्रकृति और मनुष्य का गहरा संबंध उभरता है।

फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ में गांव का जिक्र

मैला आंचल में गांव का जिक्र केंद्रीय पात्र के तौर पर रखा गया है। रेणु ने गाँव की बोली, गीत, लोक कथाएँ, पर्व-त्योहार, विश्वास और रीति-रिवाजों को पूरे रस के साथ प्रस्तुत किया है। गाँव की भाषा, मुहावरे और लहजा उसे जीवित बना देते हैं। गांव में विभिन्न जातियाँ, वर्ग और समुदाय साथ-साथ रहते दिखाई देते हैं। आपसी टकराव, सहयोग, ईर्ष्या और अपनापन—सब कुछ बहुत स्वाभाविक रूप में उभरता है। गांव की बदहाली केवल आर्थिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा से भी जुड़ी है। मलेरिया, अंधविश्वास और अशिक्षा गाँव के जीवन को पकड़े हुए हैं, उन्हें उपन्यास में गहराई से दिखाया गया है। कुल मिलाकर देखा जाए, तो मैला आंचल में गांव भारतीय ग्रामीण जीवन का धड़कता हुआ सच है। जहाँ लोक संस्कृति की सुंदरता है, समस्याओं की ‘मैला परत’ है और साथ ही बदलाव की उम्मीद भी छिपी हुई है।

श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ में गांव का जीवन

राग दरबारी में गांव का जीवन एक तीखे व्यंग्य के साथ पेश किया गया है। यहां पर गांव में हर गतिविधि पर राजनीति हावी है। पंचायत से स्कूल और अस्पताल तक भी। रिश्वत, सिफारिश, जुगाड़ और भाई-भतीजावाद गाँव के जीवन का सामान्य हिस्सा बन गए हैं। नैतिकता केवल दिखावे तक सीमित है। इस उपन्यास में दिखाया गया है कि गांव का स्कूल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि राजनीति का अखाड़ा है। अध्यापक और छात्र दोनों व्यवस्था के शिकार हैं, जिससे शिक्षा का उद्देश्य ही विकृत हो जाता है। धर्म, आदर्श और नैतिकता की बातें बहुत होती हैं, पर व्यवहार में स्वार्थ और चालाकी दिखाई देती है। गाँव का समाज भीतर से खोखला है। उल्लेखनीय है कि राग दरबारी में गांव भारतीय ग्रामीण जीवन का ऐसा रूप है, जहां पर सत्ता, स्वार्थ और पाखंड ने मानवीय मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। यह उपन्यास एक तरह से ग्रामीण समाज पर तीखा व्यंग्य है। 

शिवपूजन सहाय की ‘बेलनिया’ में गांव का जीवन

शिवपूजन सहाय के उपन्यास ‘बेलनिया’ में गाँव का जीवन संवेदनशील, यथार्थपरक और मानवीय करुणा से भरा हुआ चित्रित हुआ है। यह गाँव किसी राजनीतिक व्यंग्य का केंद्र नहीं, बल्कि साधारण ग्रामीण जनजीवन की पीड़ा और संघर्ष का सजीव चित्रण है।बलनिया का गाँव आर्थिक अभावों से जूझता हुआ दिखाई देता है। किसान, मजदूर और स्त्रियां रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करते हैं। जीवन कठिन है, पर जिजीविषा बनी रहती है। उपन्यास में स्त्री के दुख, त्याग और शोषण को विशेष संवेदना के साथ प्रस्तुत किया गया है। बेलनिया का चरित्र ग्रामीण स्त्री की असहायता और मौन पीड़ा का प्रतीक है। जाति-प्रथा, पुरुष-प्रधान मानसिकता और सामाजिक दबाव गाँव के जीवन को जकड़े हुए हैं। व्यक्ति अक्सर समाज के सामने विवश दिखाई देता है। कठिनाइयों के बावजूद गाँव में रिश्तों की गर्माहट, सहानुभूति बेलनिया’ में गाँव शोरगुल या व्यंग्य का नहीं, बल्कि मौन पीड़ा, सामाजिक बंधनों और मानवीय करुणा का प्रतीक है।और अपनापन मौजूद है। दुख के समय लोग एक-दूसरे के सहारे खड़े होते हैं।

फणीश्वरनाथ रेणु की ‘जुलूस’ में ग्रामीण जीवन का चित्रण 

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘जुलूस’ में ग्रामीण जीवन का चित्रण अत्यंत यथार्थवादी, करुण और व्यंग्यात्मक रूप में हुआ है। यह कहानी गाँव की राजनीतिक चेतना, सामाजिक संरचना और आम आदमी की विवशताओं को उजागर करती है।जुलूस में स्वतंत्रता के बाद की राजनीति गाँव में प्रवेश कर चुकी है। नेता और कार्यकर्ता गाँव के लोगों को नारों और लालच के सहारे जुलूस में शामिल करते हैं।ग्रामीण जनता गरीबी, अशिक्षा और विवशता के कारण राजनीतिक चालों का शिकार बनती है। उन्हें अपने हितों की समझ कम है, इसलिए वे आसानी से बहकाए जाते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए, तो जुलूस’ में ग्रामीण जीवन राजनीतिक शोषण, गरीबी और भोलेपन का प्रतीक बनकर सामने आता है। रेणु ने गाँव के आम जन की विवशता और चेतना के संकट को बड़ी संवेदनशीलता से उकेरा है।

मुंशी प्रेमचंद की ‘निर्मला’ में ग्रामीण जीवन का चित्रण

 मुंशी प्रेमचंद की निर्मला में ग्रामीण जीवन को दहेज और सामाजिक दबाव के तौर पर दिखाया गया है। ग्रामीण समाज में दहेज एक भयावह समस्या के रूप में उपस्थित है। इसी के कारण निर्मला का जीवन त्रासदी में बदल जाता है। यह गाँव की रूढ़ मानसिकता को उजागर करता है। इस उपन्यास में भी यह बताया गया है कि गाँव में पुरुष-प्रधान सोच हावी है। स्त्री को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है; उसका जीवन परिवार और समाज की इच्छाओं से नियंत्रित होता है। ग्रामीण जीवन आर्थिक तंगी से ग्रस्त है। निर्धन परिवार सामाजिक मान-प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए कर्ज और समझौते करने को मजबूर हैं। निर्मला’ में ग्रामीण जीवन सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक दबावों और स्त्री-पीड़ा से ग्रस्त दिखाई देता है। प्रेमचंद ने गाँव के माध्यम से पूरे समाज की कड़वी सच्चाइयों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।  

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