हिंदी साहित्य की दुनिया में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का स्थान विशेष है। आप इसी से समझ गए होंगे कि उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी गई है, जो यह साबित करता है कि किस तरह हिंदी साहित्य में उनकी मौजूदगी अतुलनीय रही है। रामधारी सिंह दिनकर के लेखन और उनके विचारों में राष्ट्रप्रेम की अलौकिक ज्योति दिखाई देती थी। दिनकर जी ने अपने शब्दों की माला से आजादी की लड़ाई को गति दी, इसके साथ ही स्वतंत्र भारत की आत्मा को भी एक धैर्यपूर्ण आवाज दी। 23 सितंबर को उनके जन्मदिन के मौके पर आइए एक बार फिर से उनके जीवन, लेखन और साहित्य यात्रा को पढ़ते हैं।
जीवन की शुरुआत
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद से रामधारी सिंह दिनकर के परिवार का जीवन संघर्ष से भर गया। कई सारी आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा को हमेशा जारी रखा। उन्होेंने हमेशा अपने जीवन में पढ़ाई को महत्व दिया। पटना के विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की उपाधि प्राप्त की और इसी के जरिए उनका झुकाव साहित्य और राष्ट्रीय राजनीति की तरफ गहराता गया। पढ़ाई के बाद उन्होंने अपने काम की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की। इसके बाद बाद उन्होंने बिहार सरकार में जनसंपर्क और राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। इसके बाद साल 1959 से 1964 तक वे राज्यसभा के सदस्य बने रहें और फिर भारत सरकार में उन्होंने बतौर हिंदी सलाहकार के तौर पर कार्य किया।
रामधारी सिंह दिनकर की साहित्य यात्रा
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी साहित्य यात्रा को खुद के लिए और पाठकों के लिए अविस्मरणीय बना दिया। रामधारी सिंह दिनकर की साहित्य यात्रा कई सारे रंगों से भरपूर रही है। उन्होंने वीर रस को अपने लेखनी में प्राथमिकता दी। इतना ही नहीं अपनी लेखनी में रामधारी सिंह दिनकर ने करुणा, प्रेम, विरोध , क्रांति, धर्म, नीति, राजनीति के साथ कई सारे सामाजिक मूल्यों को केंद्र में बनाए रखा। उनकी प्रमुख रचनाएं की भी गिनती अनगिनत रही है। लेकिन उनके कुछ चुनिंदा लेखनी की बात करें, तो 1935 में प्रकाशित रेणुका, 1938 में प्रकाशित हुंकार, 1939 में प्रकाशित रसवंती, 1946 में प्रकाशित कुरुक्षेत्र, 1951 में प्रकाशित धूप और धुंआ, 1952 में प्रकाशित रश्मिरथी, 1956 में प्रकाशित संस्कृति के चार अध्याय, और परशुराम की प्रतीक्षा का नाम शामिल है। 1970 में उर्वशी के लेखन के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
कब और कैसे मिली रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्रकवि की उपाधि
जान लें कि रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्रकवि की उपाधि आधिकारिक रूप से भारत सरकार या किसी संस्था द्वारा नहीं दी गई थी। यह उपाधि उन्हें साहित्य प्रेमियों और आलोचकों द्वारा सम्मान पूर्वक दी गई। साल 1950 से 1960 के दशक में रामधारी सिंह दिनकर ने कई सारी कविताएं लिखी, जैसे कि रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, सांस्कृतिक भारत। उनकी यह सभी कविताएं जनता के बीच काफी लोकप्रिय हुईं। उनकी कविताओं में खासतौर पर देशभक्ति, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का भाव था। इस वजह से उन्हें राष्ट्रकवि के रूप में लोकप्रियता मिलने लगी। उनकी लेखनी से कायल होकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद दिनकर की कविताओं की सराहना की और साथ ही वह उनकी लेखनी के प्रशंसक भी रहे थे। उन्होंने भी दिनकर की लेखनी से प्रभावित होकर उन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से संबोधित किया था।
उल्लेखनीय है कि रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्रकवि की उपाधि मिलने के पीछे एक सबसे बड़ी वजह उनके विचार रहे हैं। यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि दिनकर की रचनाएँ भारत की स्वाधीनता संग्राम और उसके बाद के राष्ट्र निर्माण के विचारों से प्रभावित रही हैं। उन्होंने अपने काव्य में हमेशा से ही शौर्य, वीर रस और जन भावनाओं को आवाज दी है, जो कि हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। आइए पढ़ते हैं रामधारी सिंह दिनकर की लोकप्रिय कविताओं के अंश।
रश्मिरथी
रश्मिरथी में दिनकर जी ने महाभारत के कर्ण को केंद्र में रखकर संवेदनशीलता और न्याय की मांग प्रस्तुत की है, जो कि आज भी प्रासंगिक है। महाभारत का इतिहास गवाह है कि कर्ण अपने जन्म से नहीं कर्म से महान बना, उसी की कथा को दिनकर जी ने जोड़ते हुए लिखा है। कर्ण के जरिए दिनकर जी ने जाति और सामाजिक अन्याय पर प्रहार किया है। उन्होंने लिखा है कि वह प्रतिष्ठा क्या जो बलहीनों को मिले उधार, सह सकते हैं सहनशीलता जो अत्याचार? इस कविता के कुछ अंश इस प्रकार भी हैं कि मेरे भारत के वीर पुरुषों ,तुम न इतिहास के केवल पन्नों में जीवित हो,बल्कि जनमानस के हृदय में अमर हो।
भारत की सांस्कृतिक यात्रा
इस ग्रंथ में दिनकर ने भारत की सांस्कृतिक यात्रा को चार कालखंडों में विभाजित कर प्रस्तुत किया है – वेद काल, बौद्ध काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल। यह सिर्फ साहित्यिक ही नहीं, एक ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ भी है जो यह समझाने की कोशिश करता है कि भारत की संस्कृति विविधताओं में एकता के सूत्र से बंधी रही है। यह भी जान लें कि रामधारी सिंह दिनकर की भाषा संस्कृत और हिंदी से मिली जुली होने के बाद भी बेहद सहज और प्रभावशाली है। उन्होंने एक तरफ जहां वीर रस का सृजन किया, तो वहीं अपनी लेखनी में कोमल भावनाओं, प्रकृति के सौंदर्य और नारी सौंदर्य का भी बखूबी चित्रण किया। दूसरी तरफ उनकी काव्य शैली में छंद और तर्क भी अद्भुत तरीके से लिखा हुआ मिलता है, जो कि उनकी लेखनी को हर तरह से प्रभावशाली बनाता है।
परशुराम की प्रतीक्षा
वो पुरुष जिसके श्राप में छुपा है प्रलय का बीज,
उस परशुराम की प्रतीक्षा है, आज भी इस धरती पर।
सिंहासन खाली करो( आजादी के आंदोलन से संबंधित कविता)
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है,
धूप-छांव के इस जीवन में नया सूरज उगता है।
वीर रस
वीरता का वह शौर्य गाथा गाओ, जिससे संप्रभुता के झंडे फिर लहराओ।
विदित हो कि रामधारी सिंह दिनकर को कई सारे सम्मान और पुरस्कार मिले हैं। अगर चुनिंदा पुरस्कारों की बात की जाए, तो साल 1959 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार मिला। साल 1959 में उन्हें संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। साल 1972 में उन्हें उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। साल 1952 से 1964 में उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी दी गई। आज भले बी राष्ट्रकवि दिनकर हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी लेखनी और उनके विचार युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं। उनकी लेखनी आज भी हिंदी साहित्य की दुनिया में प्रखरता से जलते हुए प्रेरणा और चेतना जगा रही है।