हिंदी साहित्य की आजाद और बेबाक लेखिका अमृता प्रीतम रही हैं। अमृता प्रीतम उस वक्त औरतों की आवाज बनीं, जब महिलाओं को लेकर लेखनी भी अपनी मर्यादा पार नहीं कर सकती थी। लेकिन उस दौर में भी अमृता प्रीतम ने एक महिला को खुलकर जीने की सोच दी। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए बताया कि एक औरत प्रेम कर सकती है, विरोध कर सकती है और प्रतिरोध भी कर सकती है। भारतीय साहित्य की इस लोकप्रिय कवयित्री, उपन्यासकार और नारीवादी स्वर की प्रतीक अमृता प्रीतम का 31 अगस्त को जन्मदिन है। इस मौके पर आइए विस्तार से जानते हैं और करीब से पढ़ते हैं, अमृता प्रीतम के जीवन और लेखन के बारे में।
कवि परिवार में जन्म
अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला में हुआ। उस वक्त गुजरांवाला भारत में हुआ करता था। विभाजन के बाद अब पाकिस्तान में है। उनके पिता कवि और अध्यापक थे, जिनसे उन्हें साहित्यिक विरासत मिली है। केवल 11 साल की उम्र में मां के निधन ने अमृता प्रीतम के अंदर गहरी संवेदनशीलता जगा दी और लेखनी की तरफ उन्होंने खुद को मोड़ लिया। साफ तौर पर उनकी लेखनी में मां के न होने का दर्द झलकता है। यही वजह रही कि जिस उम्र में लड़कियां संभलना सीखती हैं, उसी दौरान अमृता प्रीतम ने अपनी पहली कविता लिखी। 17 साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह अमृत लेख छपा। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। इसके बाद असली अमृता तब सामने आयीं, जब उन्होंने अपने समय के सामाजिक,राजनीतिक और निजी विषयों को बेबाकी से लिखना शुरू किया।
विभाजन ने बदला लेखनी और जीने का मोड़
अपनी लेखनी के दौरान अमृता प्रीतम ने विभाजन का दर्द भी देखा। 1947 में भारत-पाक विभाजन अमृता के जीवन में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया है। उन्होंने अपनी लेखनी में विभाजन को एक महिला के नजरिए से पेश किया। विभाजन पर उन्होंने अपनी लोकप्रिय कविता लिखी। इस कविता का नाम अज्ज आखां वारिस शाह नूं रखा। हिंदी में इसका मतलब आज मैं वारिस शाह से कहती हूं है। इस कविता में उन्होंने उस दर्द को आवाज दी, जहां उनकी लेखनी में विभाजन के दौरान खून, चीखें, लूट और बलात्कार का दर्द दिखाया। उल्लेखनीय है कि इस कविता में उन्होंने 18 वीं सदी के लोकप्रिय पंजाबी कवि वारिस शाह को पुकारा, जो हीर-रांझा की प्रेम कथा के लिए जाने जाते हैं और कहा कि अब नई कहानी लिखो, उस पंजाब की जो लहूलुहान है।
वक्त के साथ बनीं साहित्य की नायक
कविता के साथ साहित्य में भी अपनी अलौकिक लेखनी को अमृता प्रीतम ने पेश किया। दिलचस्प यह रहा है कि उन्होंने अपनी कहानी में भी एक महिला को नायक के तौर पर पेश किया। उन्होंने ऐसी महिला पेश की, जो कि सवाल करती है,जवाब देती है, गलत को नकारती है और आत्मरक्षा के साथ आत्म निर्णय लेने के काबिल है। इसी फेहरिस्त में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने जीवन को रसीदी टिकट में लपेटकर पाठकों के लिए पेश किया। यह एक साहसिक दस्तावेज है। इस किताब में अमृता ने अपने जीवन, प्रेम, पीड़ा और आत्मचिंतन को रखा है।
अमृता प्रीतम की लोकप्रिय किताबों पर एक नजर
'पिंजर' उनका लोकप्रिय उपन्यास है। यह भारत-पाक विभाजन के दौरान एक महिला की त्रासदी को पेश किया है। इस पर एक लोकप्रिय फिल्म भी बन गई है। इस कहानी में नायिका 'पूरो' विभाजन के दर्द और महिला की स्थिति को दिखाती है। इसके बाद बारी आती है, 'कागज ते कैनवास' की। यह किताब चित्रकार इमरोज के साथ अमृता प्रीतम के साथ उनके संबंध, कला और प्रेम की बात कही है। 'नगमे की मौत' भी अमृता प्रीतम की लोकप्रिय कविता संग्रह में शामिल है, जो कि प्रेम, पीड़ा और जीवन के अनुभव पर आधारित है। उनकी लिखी हुई कहानी, 'आखिरी खत' भी काफी लोकप्रिय है। यह कहानी एक मां के अपने बच्चे को लिखे गए आखिरी पत्र पर आधारित है। उनका लिखा हुआ उपन्यास सत्रहवीं सदी भी काफी लोकप्रिय है। यह उपन्यास ऐतिहासिक और प्रेम की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसके बाद उनकी एक और लोकप्रिय कविता मैं तैनू फेर मिलांगी भी है। यह कविता प्रेम और आत्मा की अमरता का दर्शाने वाली अत्यंत भावनात्मक कविता है।
अमृता प्रीतम के जीवन में साहिर और इमरोज
साहिर लुधियानवी फिल्मी गीतकार और उर्दू के लोकप्रिय शायर थे। उनका और अमृता प्रीतम का रिश्ता कृष्ण और मीरा की तरह था। अमृता एकतरफा प्रेम और गहरे जुड़ाव के साथ साहिर लुधवानी से जुड़ी हुई थीं। उन्होंने साहिर के लिए अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में गहराई से लिखा है। अमृता को लगता था कि साहिर भी उनसे प्रेम करते थे, लेकिन कभी जमाने के सामने इसे अपना नहीं पाएं और अमृता प्रीतम से खुलकर कह भी नहीं पाएं। साहित्य की दुनिया में यह कहा जाता है कि सामिजक और निजी कारणों से ये प्रेम परिपूर्ण नहीं हो पाया। हालांकि अमृता का प्रेम साहिर के लिए अमहा। इमरोज और अमृता प्रीतम का साथ जीवन से जुड़ा। इमरोज एक चित्रकार और लेखक थे, उन्होंने अमृता प्रीतम से प्रेम किया और उनके साथ जीवन बिताया। यह कहा जाता है कि इमरोज ने कभी अपने प्रेम का इजहार अमृता से नहीं किया, बल्कि उसे उनके साथ रहकर जीना है। इमरोज और अमृता का रिश्ता 40 साल का रहा है, बिना विवाह के भी दोनों एक समर्पित रिश्ते में थे। इमरोज के साथ अपने रिश्ते पर अमृता ने लिखा था कि इमरोज चुपचाप उनके लिए चाय बना देते, उनका कमरा साफ करते और चित्र बनाते। इमरोज ने अमृता से कभी नहीं कहा कि मुझे प्रेम करो। उन्होंने अमृता के दिल में बसे साहिर के प्रेम को अपनाया।
अमृता प्रीतम लेखनी और सम्मान
अमृता ने पंजाबी में भी भरपूर लिखा। लेकिन उनकी रचनाएं हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में भी खूब पढ़ी जाती है। उनकी प्रमुख कृतियां कविता संग्रह 'नागमणि', 'सूरज दी आख', 'चाक नं चक्कर' है। उपन्यास पर ध्यान दिया जाए, तो 'पिंजर', 'धरती-सागर ते सीपियां' आदि शामिल हैं। अमृता प्रीतम को उनकी लेखनी के लिए कई सारे सम्मान और पुरस्कार मिला। खासतौर पर भारत सरकार द्वारा अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि ज्ञानपीठ पाने वाली पहली महिला लेखिका बनीं।
अमृता प्रीतम के लेखनी में महिलाएं
दिलचस्प यह है कि अमृता प्रीतम की लेखनी महिलाएं सवाल करती हैं। मैं कौन हूं? क्या मैं सिर्फ किसी की पत्नी, बेटी या माँ हूँ? क्या मेरी इच्छाएं, सपने, अधिकार नहीं है? उनके लिखे हुए महिला किरदार की यह सोच महिलाओं को सोचने का नया नजरिया देती है और बताती हैं कि महिलाएं अपने जीवन के फैसले लेने में सक्षम हैं। इतना ही नहीं अमृता ने अपनी लिखावट में एक महिला के शरीर, यौनिकता और ख्वाहिश पर भी लिखा है। उन्होंने उस दौर पर अपने लेखन में इन सबको शामिल किया, जब यह विषय सोचना भी वर्जित माना जाता था। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए बताया कि एक महिला का शरीर उसकी अपनी संपत्ति है। उस पर किसी और का अधिकार नहीं है। उन्होंने समाज की उस मानसिकता को भी चुनौती दी है, जो एक महिला के देह को संकोच और शर्म से जुड़ती थी। इसलिए यह कहा जाता रहा है और इसे स्वीकारा जा चुका है कि अमृता प्रीतम केवल एक लेखिका नहीं हैं, बल्कि एक प्रेरणा हैं। हर उस महिला के लिए, जो खुद की तलाश में है।